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Showing posts from June, 2026

चिंतन - क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है?

  चिंतन -  क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है? हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ गति को सफलता समझ लिया गया है। सब कुछ शीघ्र चाहिए—ज्ञान भी, धन भी, प्रेम भी, प्रतिष्ठा भी। प्रतीक्षा अब गुण नहीं, बाधा मानी जाने लगी है। अधैर्य हमारे समय का सबसे बड़ा संस्कार बनता जा रहा है। तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है— क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है? धैर्य का अर्थ रुक जाना नहीं है। धैर्य का अर्थ है—चलते रहना, बिना घबराए। नदी को समुद्र तक पहुँचने की जल्दी नहीं होती। वह हर मोड़ को स्वीकार करती है, हर पत्थर को छूती है, हर घाट को प्रणाम करती हुई आगे बढ़ती है। यदि वह अधीर हो जाए, तो बाढ़ बन जाएगी; यदि धैर्य रखे, तो जीवन बन जाएगी। मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है। जब वह समय से लड़ता है, तो भीतर बाढ़ आ जाती है। जब वह समय के साथ चलना सीखता है, तो जीवन में लय उतर आती है। धैर्य की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि वह देर तक प्रतीक्षा कर सकता है। उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि प्रतीक्षा के दौरान भी उसका विश्वास नहीं टूटता। यही धैर्य को साधारण सहनशीलता से अलग करता है। सहन करना कभी-कभी विवशत...

चिंतन - क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है?

  चिंतन -   क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है? मनुष्य ने पर्वत जीते, समुद्र पार किए, आकाश में उड़ना सीख लिया। उसने प्रकृति की अनेक शक्तियों को अपने ज्ञान से बाँध लिया। पर एक युद्ध ऐसा है, जिसमें सबसे अधिक पराजय मनुष्य को स्वयं से ही मिलती है। वह युद्ध है— क्षमा का। तभी मेरे भीतर यह प्रश्न उठता है— क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है? क्षमा को हम प्रायः दुर्बलता समझ लेते हैं। हमें लगता है कि जिसने प्रतिकार नहीं किया, वह हार गया। जिसने बदला नहीं लिया, वह कमज़ोर पड़ गया। किन्तु जीवन बार-बार सिखाता है कि प्रतिशोध के लिए जितनी शक्ति चाहिए, उससे कहीं अधिक शक्ति क्षमा के लिए चाहिए। क्रोध सहज है। प्रतिशोध स्वाभाविक है। पर क्षमा—साधना है। क्रोध बाहर की घटना से जन्म लेता है; क्षमा भीतर की परिपक्वता से। यही कारण है कि क्षमा किसी दूसरे पर किया गया उपकार नहीं, स्वयं पर किया गया अनुग्रह है। जिसे हम क्षमा नहीं करते, वह व्यक्ति हमारे भीतर जीवित रहता है। वह हमारी स्मृतियों में बार-बार लौटता है। उसके कारण हमारा मन अशांत होता है। हम समझते हैं कि हम उसे दंड दे रहे हैं, जबकि वास्तव में ...

चिंतन - क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है?

  चिंतन -  क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है? मनुष्य ने घर बनाए—ईंटों के, पत्थरों के, लकड़ियों के। फिर उसने परिवार बनाए, समाज बनाए, राष्ट्र बनाए। पर इन सबके बीच वह एक ऐसे घर की तलाश करता रहा, जहाँ प्रवेश के लिए न कोई परिचय-पत्र चाहिए, न कोई रक्त-संबंध, न कोई अधिकार। शायद उस घर का नाम मैत्री है। तभी मेरे भीतर यह प्रश्न उठता है— क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है? मैत्री का अर्थ केवल मित्र होना नहीं है। मित्रता दो व्यक्तियों के बीच हो सकती है, पर मैत्री चेतना की अवस्था है। वह किसी एक मनुष्य तक सीमित नहीं रहती। उसका स्वभाव फैलना है। जिस प्रकार दीपक यह नहीं चुनता कि किस दिशा में प्रकाश देना है, उसी प्रकार मैत्री यह नहीं चुनती कि किसे अपनापन देना है। वह विभाजन नहीं करती। वह उपस्थिति बन जाती है। हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लोग परिचित बहुत हैं, पर मित्र बहुत कम। और उससे भी बड़ी विडंबना यह है कि मित्र तो मिल जाते हैं, पर मैत्री दुर्लभ होती जा रही है। क्योंकि मित्रता कभी-कभी स्वार्थ से भी बन जाती है। मैत्री कभी नहीं। मित्रता परिस्थितियों से जन्म ले सकती है। मैत्...

चिंतन - क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है?

  चिंतन -  क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है? ज्ञान मनुष्य को बहुत कुछ दे सकता है—तर्क, प्रमाण, विवेक, उपलब्धियाँ और प्रतिष्ठा। परंतु एक प्रश्न मेरे भीतर अक्सर देर तक ठहरा रहता है—यदि ज्ञान मनुष्य को अधिक विनम्र, अधिक सहृदय और अधिक मानवीय न बना सके, तो क्या वह वास्तव में ज्ञान है? यहीं से एक विचार जन्म लेता है— क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है? ज्ञान का पहला चरण जानना है। दूसरा समझना। और अंतिम—अनुभव करना। पर करुणा इन तीनों से भी आगे की अवस्था है। वहाँ हम केवल किसी का दुःख नहीं जानते, उसे समझते भी नहीं; हम उसे अपने भीतर महसूस करने लगते हैं। यही वह क्षण है जहाँ ज्ञान हृदय का रूप ले लेता है। सूखी धरती पर वर्षा का कोई सिद्धांत काम नहीं आता; वहाँ पानी चाहिए। उसी प्रकार जीवन में ऐसे अनेक क्षण आते हैं, जहाँ तर्क हार जाते हैं और करुणा जीत जाती है। किसी रोते हुए बच्चे को दर्शन नहीं चाहिए, माँ की गोद चाहिए। किसी शोकाकुल व्यक्ति को शास्त्रों के उद्धरण नहीं चाहिए, किसी का मौन स्पर्श चाहिए। किसी अकेले मनुष्य को सलाह नहीं चाहिए, साथ चाहिए। शायद इसी का नाम करुणा है। करुणा दया नह...

जेब

  जेब उसने पूछा तुम्हारी कमीज़ की जेब हमेशा खाली क्यों रहती है? मैंने कहा ज़रूरत पड़े तो भर लूँगा। वो बोली क्या? मैंने कहा जो मिल जाए। वो मुस्कुराकर बोली— नहीं... तुम्हारी जेब इसलिए खाली रहती है, क्योंकि तुम चीज़ें नहीं, लोग रखते हो। और लोग... जेब में नहीं, कमी छोड़ जाते हैं। — मुकेश

तकिया

  तकिया उसने पूछा तुम्हारा तकिया इतना दबा हुआ क्यों है? मैंने कहा सिर रखता हूँ उस पर। वो हँसी— सब रखते हैं। इतना तो किसी का नहीं दबता। मैंने कहा नींद से ज़्यादा ख़याल रखता हूँ। कुछ देर चुप रही। फिर बोली— अच्छा... इसलिए तुम्हारे ख़याल सुबह उठ जाते हैं, और तुम देर तक सोते रहते हो। — मुकेश

चिंतन - क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है?

  चिंतन -  क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है? मनुष्य का इतिहास यदि ध्यान से पढ़ा जाए, तो वह उत्तरों का इतिहास कम और प्रश्नों का इतिहास अधिक प्रतीत होता है। प्रत्येक युग ने अपने उत्तर गढ़े, और प्रत्येक अगला युग उन्हीं उत्तरों पर नए प्रश्न लेकर खड़ा हो गया। मानो सत्य कोई स्थिर शिला नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षितिज है जो हर कदम पर थोड़ा और दूर चला जाता है। तब मन में एक विचार उठता है— क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है? उत्तर प्रायः समय के होते हैं, प्रश्न चेतना के। उत्तर परिस्थितियों के साथ बदल जाते हैं; प्रश्न युगों को पार कर जाते हैं। आज भी वही प्रश्न हमारे भीतर जीवित हैं जो हजारों वर्ष पहले किसी ऋषि, किसी दार्शनिक, किसी कवि या किसी साधारण मनुष्य के भीतर उठे होंगे— मैं कौन हूँ? सत्य क्या है? प्रेम क्यों है? दुःख का अर्थ क्या है? और सबसे बड़ा प्रश्न— मैं यहाँ क्यों हूँ? इन प्रश्नों का कोई अंतिम उत्तर आज तक नहीं मिला। फिर भी मनुष्य उन्हें छोड़ता नहीं। शायद इसलिए कि कुछ प्रश्न हल करने के लिए नहीं, मनुष्य को विकसित करने के लिए जन...

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, पञ्चदश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन

 गवद्गीता प्रथम अध्याय, पञ्चदश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मूल श्लोक - पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।-पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ॥ १.१५ ॥ हृषीकेशः पाञ्चजन्यं दध्मौ, धनञ्जयः देवदत्तं (शङ्खं दध्मौ), भीमकर्मा वृकोदरः महाशङ्खं पौण्ड्रं दध्मौ। सामान्य हिन्दी अर्थ हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य शंख बजाया, धनंजय अर्जुन ने देवदत्त शंख बजाया और भयंकर कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने महाशंख पौण्ड्र बजाया। अब केवल शंख नहीं, व्यक्तित्व बोल रहे हैं पिछले श्लोक में व्यास ने कहा था कि कृष्ण और अर्जुन ने दिव्य शंख बजाए। अब वे उन शंखों के नाम बताते हैं। पहली दृष्टि में यह सामान्य विवरण लगता है। किन्तु प्रश्न उठता है— यदि केवल युद्ध का वर्णन करना होता, तो शंखों के नाम बताने की आवश्यकता क्या थी? क्योंकि भारतीय परम्परा में नाम केवल पहचान नहीं, स्वभाव का संकेत होता है। यहाँ शंख नहीं बज रहे। यहाँ तीन चेतनाएँ बोल रही हैं— कृष्ण की चेतना, अर्जुन की चेतना ,भीम की चेतना और आश्चर्य यह है कि तीनों के शंख उनके आन्तरिक स्वरूप का परिचय देते हैं...

चिंतन - क्या संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी होता है?

  चिंतन -  क्या संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी होता है? हमने बचपन से सीखा कि संदेह बुरा है। संदेह विश्वास को तोड़ देता है, संबंधों को कमज़ोर कर देता है, मन को अशांत कर देता है। इसलिए हमें विश्वास करना सिखाया गया, प्रश्न करना नहीं; स्वीकार करना सिखाया गया, परखना नहीं। परंतु कभी-कभी मैं सोचता हूँ—यदि संसार के हर सत्य को बिना संदेह के स्वीकार कर लिया जाता, तो क्या मनुष्य कभी सत्य तक पहुँच पाता? शायद नहीं। क्योंकि हर महान खोज की शुरुआत विश्वास से नहीं, संदेह से हुई है। संदेह का स्वभाव विचित्र है। वह नकार नहीं है; वह सत्य के प्रति ईमानदारी है। वह कहता है— "मैं मानने को तैयार हूँ, पर पहले जानना चाहता हूँ।" यही आग्रह मनुष्य को भीड़ से अलग करता है। भीड़ विश्वास करती है; साधक सत्यापित करता है। इसलिए संदेह को केवल संशय कहना उसके साथ अन्याय होगा। वह चेतना का जागरण भी है। एक शिशु जब पहली बार किसी वस्तु को हाथ में लेकर उसे उलट-पलट कर देखता है, तब वह केवल खेल नहीं रहा होता; वह संसार पर संदेह कर रहा होता है। वह यह स्वीकार नहीं करता कि जो दिखाई दे रहा है, वही उसका संपूर्ण स्वरूप है। उसकी जिज्ञास...

.चिंतन - क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है?

 . चिंतन -  क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है? मनुष्य ने प्रेम की अनेक परिभाषाएँ लिखीं, पर शायद उसकी सबसे सच्ची परिभाषा कभी शब्दों में नहीं आई। वह आई—प्रतीक्षा में। मैं अक्सर सोचता हूँ, प्रेम की पहचान मिलन से कम और प्रतीक्षा से अधिक क्यों होती है? जो सहज उपलब्ध है, वह मन को प्रिय हो सकता है; किंतु जो अनुपस्थित होकर भी भीतर उपस्थित रहे, वही शायद प्रेम है। इसलिए प्रश्न उठता है—क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है? प्रतीक्षा समय को केवल काटती नहीं, उसे अर्थ भी देती है। जिस समय में किसी की प्रतीक्षा न हो, वह केवल घड़ी की सूइयों का चलना है। किंतु जिस क्षण किसी के आने की संभावना मन में हो, वही क्षण अचानक जीवित हो उठता है। तब एक-एक पल अपनी अलग ध्वनि रखने लगता है। समय तब कैलेंडर नहीं रहता, धड़कन बन जाता है। ध्यान से देखिए, प्रकृति का अधिकांश सौंदर्य भी प्रतीक्षा में ही जन्म लेता है। बीज वर्षा की प्रतीक्षा करता है। धरती बादलों की। भोर सूर्य की। चकोर चंद्रमा की। और समुद्र उस नदी की, जो अंततः उसकी ओर लौटेगी। प्रकृति जानती है कि जो बिना प्रतीक्षा के मिल जाए, उसका मू...

चिंतन - क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है?

  चिंतन -  क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? मनुष्य ने बोलना बहुत पहले सीख लिया था, पर मौन को पढ़ना आज तक नहीं सीख पाया। शब्दों का अपना व्याकरण है, अपना कोश है, अपना इतिहास है; किंतु मौन का कोई शब्दकोश नहीं। उसे किसी भाषा में नहीं बाँधा जा सकता। वह लिखा कम जाता है, जिया अधिक जाता है। शायद इसीलिए मैं कभी-कभी सोचता हूँ—क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? ऐसा शास्त्र, जिसे पढ़ने के लिए आँखों से अधिक अंतःकरण की आवश्यकता होती है। हमने ज्ञान को प्रायः शब्दों में खोजा है। ग्रंथ लिखे, भाष्य रचे, वाद-विवाद किए। किंतु क्या यह विचित्र नहीं कि सबसे बड़ी अनुभूतियाँ शब्दों के समाप्त होने पर ही घटित होती हैं? प्रेम अपने चरम पर पहुँचकर चुप हो जाता है। शोक अपनी गहराई में पहुँचकर रोना भी छोड़ देता है। प्रार्थना अपने शुद्धतम रूप में शब्दों की याचना नहीं रहती, केवल एक मौन उपस्थिति बन जाती है। मानो शब्द यात्रा हों और मौन गंतव्य। मौन को अक्सर लोग अनुपस्थिति समझ लेते हैं। जैसे कुछ न कहना, कुछ न होना। परंतु मौन रिक्तता नहीं, परिपूर्णता भी हो सकता है। जिस प्रकार आकाश खाली दिखाई देता है, जबकि उसी ...

चिंतन - क्या स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी हैं?

  चिंतन -  क्या स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी हैं? नदियाँ केवल पृथ्वी पर नहीं बहतीं। कुछ नदियाँ मनुष्य के भीतर भी बहती हैं। बाहर की नदियाँ समुद्र तक पहुँच जाती हैं, भीतर की नदियाँ कभी किसी किनारे तक नहीं पहुँचतीं। वे जीवन भर बहती रहती हैं—कभी दिखाई देती हुई, कभी भूमिगत होकर। उनका नाम है— स्मृति। मैं अक्सर सोचता हूँ कि समय को यदि किसी रूपक में बाँधना हो, तो वह घड़ी नहीं होगी, कैलेंडर भी नहीं। समय शायद एक नदी होगा। और यदि स्मृति को किसी रूपक में समझना हो, तो वह उस नदी का सबसे धीमा प्रवाह होगी। धीमी इसलिए कि वह कभी सचमुच बीतती नहीं। हम मान लेते हैं कि घटनाएँ पीछे छूट गईं। लोग चले गए। घर बदल गए। शहर बदल गए। ऋतुएँ बदल गईं। लेकिन स्मृति का जल किसी अदृश्य घाट पर ठहरा रहता है। वर्षों बाद भी कोई गंध, कोई धुन, कोई शब्द, कोई स्पर्श उस जल में हल्की-सी कंकड़ी फेंक देता है, और सतह पर फिर वही पुरानी लहरें उठने लगती हैं। समय आगे बढ़ जाता है; स्मृति पीछे नहीं रहती। वह भीतर समानांतर बहती रहती है। यही कारण है कि वृद्ध व्यक्ति अपने बचपन को वर्तमान काल में सुनाने लगता है। वह नहीं कहता—"वहाँ एक पे...

चिंतन - क्या प्रश्न भी चेतना के कठफोड़वे होते हैं?

  चिंतन -  क्या प्रश्न भी चेतना के कठफोड़वे होते हैं? कुछ प्रश्न उत्तर पाने के लिए नहीं जन्म लेते; वे भीतर सोई हुई किसी लकड़ी पर लगातार चोंच मारने के लिए आते हैं। मैंने कई बार सोचा है कि प्रश्न आखिर होते क्या हैं? क्या वे केवल भाषा के व्याकरण हैं? केवल जिज्ञासा की आकृतियाँ? या वे हमारी चेतना के ऐसे कठफोड़वे हैं, जो मन के वृक्ष पर तब तक चोंच मारते रहते हैं, जब तक भीतर छिपा हुआ कोई जीवित रस बाहर न आ जाए? वन में कठफोड़वा किसी वृक्ष को नष्ट करने नहीं आता। वह उसकी छाल पर प्रहार करता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उस कठोर सतह के नीचे जीवन की कोई हलचल है। यदि वृक्ष बिल्कुल मृत हो, तो वह वहाँ अधिक देर नहीं ठहरता। उसके प्रहार में हिंसा नहीं, खोज होती है। प्रश्न भी शायद ऐसे ही होते हैं। वे हमारी निश्चितताओं की छाल पर चोट करते हैं। वे विश्वासों के तनों पर अपनी नुकीली चोंच टिकाकर पूछते हैं—"क्या सचमुच यही सत्य है?" और जब तक भीतर से कोई उत्तर, कोई संशय, कोई नई संभावना बाहर नहीं आती, वे रुकते नहीं। मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि उसके पास उत्तर नहीं हैं। उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्...

मुहब्बत का तरीक़ा

  मुहब्बत का तरीक़ा मैंने तुम्हें कभी बाँधने की कोशिश नहीं की। जो परिंदे दिल में घर बना लेते हैं, उन्हें पिंजरों की ज़रूरत नहीं होती। मुकेश ,,,,,,,,,,

मुलाक़ात

  मुलाक़ात तुमसे हर बार मिलकर ऐसा नहीं लगता कि तुमसे मिला हूँ। लगता है, अपने ही किसी बिछड़े हुए हिस्से से वापस मिल आया हूँ। मुकेश ,,,,,,,,,,

तुमसे पहले

  तुमसे पहले तुमसे पहले भी ज़िंदगी थी। दिन निकलते थे, शामें उतरती थीं, बारिशें होती थीं। मगर... उनमें कोई मेरा इंतज़ार नहीं करता था। मुकेश ,,,,,,,,,,

इत्तिफ़ाक़

  इत्तिफ़ाक़ आज फिर तुम्हारा ज़िक्र नहीं हुआ। फिर भी, पूरी शाम तुम्हारे साथ गुज़र गई। मुकेश ,,,,,,,,,,

तुम्हें ख़बर भी नहीं

  तुम्हें ख़बर भी नहीं तुम्हें ख़बर भी नहीं, कि तुम्हारा नाम मैं कितनी बार लेता हूँ बिना पुकारे। कभी चाय की पहली चुस्की में, कभी किसी किताब के आख़िरी सफ़्हे पर, कभी शाम की ढलती हुई धूप में, और कभी... बिल्कुल बेवजह। अजीब है न, कुछ लोग याद नहीं आते, वे बस हर जगह मौजूद रहते हैं। मुकेश ,,,,,,,,,,

तुम्हारे बाद भी तुम

  तुम्हारे बाद भी तुम तुम्हें शायद कभी मालूम न हो, कि तुमसे मिलने के बाद मेरी दुनिया में कोई बड़ा इन्क़िलाब नहीं आया। बस... कुछ बहुत छोटी-छोटी चीज़ें बदल गईं। अब शामें पहले से ज़्यादा देर तक ठहरती हैं। चाय की भाप में किसी का चेहरा बनने लगा है। बारिश की पहली बूँद अब सीधे ज़मीन पर नहीं गिरती, पहले दिल पर गिरती है। तुमने कभी कोई वादा नहीं किया। मैंने भी कोई क़सम नहीं माँगी। फिर भी न जाने क्यों तुम्हारी मौजूदगी, मेरी तन्हाई की सबसे भरोसेमंद हमसफ़र बन गई। तुम्हारा नाम अब किसी पुकार की तरह नहीं आता, एक दुआ की तरह उतरता है। धीरे... बहुत धीरे... जैसे फ़ज्र से पहले आसमान पर उजाला उतरता है। मुझे तुमसे मिलने की उतनी ख़्वाहिश नहीं, जितनी तुम्हारे होने की तसल्ली है। तुम कहीं हो... बस यही एहसास मेरे कई उदास दिनों को बेआवाज़ सहारा दे देता है। मुहब्बत शायद यही होती है। किसी को हासिल कर लेना नहीं, बल्कि उसके वजूद से अपनी रूह का रिश्ता जोड़ लेना। ऐसा रिश्ता, जिसे न फ़ासले कमज़ोर करते हैं, न वक़्त। मैंने तुम्हें अपनी ज़िंदगी की किताब में किसी अध्याय की तरह नहीं रखा। तुम तो वह सफ़ेद सफ़्हा हो, जिस पर ...

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, चतुर्दश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन

 भगवद्गीता प्रथम अध्याय, त्रयोदश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मूल श्लोक -ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ १.१३ ॥ अन्वय -ततः शङ्खाः च भेर्यः च पणव-आनक-गोमुखाः च सहसा एव अभ्यहन्यन्त, सः शब्दः तुमुलः अभवत्। सामान्य हिन्दी अर्थ इसके बाद शंख, भेरी, नगाड़े, ढोल और रणभेरियाँ एक साथ बज उठीं और उनका वह शब्द अत्यन्त भयंकर एवं कोलाहलपूर्ण हो गया। क्या यह केवल युद्ध का शोर है? पहली दृष्टि में यह श्लोक केवल युद्धभूमि के वाद्ययंत्रों का वर्णन प्रतीत होता है।,शंख बजे,नगाड़े बजे,भेरियाँ बजीं,गोमुख बजे।, और एक विशाल कोलाहल उत्पन्न हुआ। किन्तु व्यास यदि केवल शोर का वर्णन करना चाहते, तो एक वाक्य पर्याप्त था। फिर इतने वाद्यों का अलग-अलग उल्लेख क्यों? क्योंकि यहाँ केवल ध्वनि नहीं है। यह मानव-चेतना के भीतर उठने वाले मानसिक कोलाहल का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक चित्रण है। 1. "ततः" — एक ध्वनि दूसरी ध्वनि को जन्म देती है श्लोक आरम्भ होता है—  ततः  "उसके बाद" यह छोटा-सा शब्द बहुत बड़ा रहस्य छिपाए हुए है। भीष्म का शंख बजा। ...

तुम्हारी हँसी

  तुम्हारी हँसी तुम्हारी हँसी... जाने उसमें ऐसा क्या है, कि जब भी सुनता हूँ, दिन की सारी थकान बिना कुछ कहे उतर जाती है। तुम हँसती हो, तो लगता है जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की अचानक खुल गई हो, और ताज़ा हवा अपने साथ थोड़ी-सी धूप भी ले आई हो। मैंने बहुत-सी आवाज़ें सुनी हैं— बारिश की, नदी की, पत्तों की सरसराहट की, मस्जिद की अज़ान की, मंदिर की घंटियों की... मगर तुम्हारी हँसी में इन सबका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा बसा है। वह शोर नहीं करती, बस दिल में उतर जाती है। तुम्हें शायद ख़बर भी नहीं होगी कि जब तुम हँसती हो, तो तुम्हारी आँखें तुम्हारे होंठों से पहले मुस्कुराती हैं। और मैं... हर बार उन्हीं आँखों में ठहर जाता हूँ। अजीब बात है, इंसान किसी के चेहरे से नहीं, उसकी हँसी से मोहब्बत करने लगता है। क्योंकि चेहरा वक़्त के साथ बदल जाता है, लेकिन हँसी... अगर दिल से निकले, तो उम्र भर वैसी ही रहती है। कभी-कभी सोचता हूँ, अगर किसी दिन तुम अपनी हँसी भूल जाओ, तो मैं उसे अपनी यादों से निकालकर फिर तुम्हें लौटा दूँगा। क्योंकि कुछ चीज़ों पर सिर्फ़ उनका हक़ नहीं होता, जो उन्...

तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो... (दूसरा पड़ाव)

 तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो... (दूसरा पड़ाव) तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो, तो तुम्हारी आँखों में एक अजीब-सी शरारत उतर आती है। होंठ शिकायत करते हैं, मगर निगाहें मेरी तरफ़ ही ठहरी रहती हैं। जैसे उन्हें पूरा यक़ीन हो कि मैं तुम्हें मनाने ज़रूर आऊँगा। तुम्हारी नाराज़गी में भी एक नाज़ है... एक अदा है... और एक ख़ामोश-सी दावत, कि मैं तुम्हारे क़रीब आकर तुम्हारी ख़ामोशी का मतलब पढ़ूँ। तुम जानती हो, तुम्हारा "बात मत कीजिए मुझसे" दुनिया का सबसे झूठा जुमला है। क्योंकि उसके अगले ही पल तुम चुपके से देखती हो कि मैंने सचमुच बात करना छोड़ तो नहीं दिया। और मैं... मैं भी कहाँ इतना समझदार हूँ। हर बार तुम्हारी उसी बनावटी नाराज़गी में अपनी मुहब्बत का नया बहाना ढूँढ़ लेता हूँ। कभी तुम्हारा हाथ थामकर, कभी तुम्हारी ज़ुल्फ़ों को कानों के पीछे सरकाकर, कभी सिर्फ़ तुम्हारा नाम लेकर। अजीब है न... मुहब्बत में सबसे मीठे लम्हे इज़हार के नहीं, मनुहार के होते हैं। जहाँ कोई सचमुच रूठा नहीं होता, मगर दोनों चाहते हैं कि मनाने का सिलसिला थोड़ा और लंबा हो जाए। इसलिए... तुम्हार...
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  तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो... तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो, तो मुझे तुम्हारी आँखों से ज़्यादा तुम्हारी ख़ामोशी पर यक़ीन आता है। वह ख़ामोशी, जो हर शिकायत से पहले मुस्कुरा देती है। तुम्हारे होंठ रूठने की कोशिश करते हैं, मगर तुम्हारी नज़रें हर बार तुम्हारा साथ छोड़ देती हैं। वे चुपके से बता देती हैं कि नाराज़गी सिर्फ़ एक बहाना है, असल बात तो यह है कि तुम चाहती हो मैं तुम्हें थोड़ा और मनाऊँ। मैं जानता हूँ... तुम्हारे "जाइए, मुझे आपसे बात नहीं करनी..." में भी एक मासूम-सी इल्तिज़ा छिपी होती है— "ज़रा-सा और ठहरो..." तुम्हारा रूठना भी कितना अजीब है। उसमें ग़ुस्से से ज़्यादा मुहब्बत होती है, शिकायत से ज़्यादा अपनापन, और अल्फ़ाज़ से ज़्यादा इंतज़ार। मैं अक्सर सोचता हूँ, अगर तुम सचमुच कभी नाराज़ हो गईं, तो शायद इतनी ख़ामोश नहीं रहोगी। क्योंकि जो लोग दिल से दूर हो जाते हैं, वे शिकायत भी नहीं करते। वे बस चले जाते हैं। इसलिए तुम्हारा यूँ बेवजह रूठ जाना, मेरे लिए इस बात का सबसे ख़ूबसूरत सबूत है कि मेरे हिस्से की जगह अब भी तुम्हारे दिल में कहीं महफ़...

शब्दयात्री — जो नहीं हुआ

  शब्दयात्री — जो नहीं हुआ ज़िंदगी में कुछ दास्तानें ऐसी भी होती हैं जो कभी लिखी नहीं जातीं, लेकिन उम्र भर पढ़ी जाती रहती हैं। वे किसी किताब के सफ़्हों पर नहीं मिलतीं, न किसी तस्वीर में क़ैद होती हैं। उनका वजूद बस दिल के किसी ख़ामोश कोने में होता है, जहाँ वक़्त की धूल भी पहुँचकर उन्हें मिटा नहीं पाती। मेरे पास भी ऐसी ही एक दास्तान है। एक दास्तान जो कभी हुई नहीं। या यूँ कहूँ कि जो पूरी नहीं हुई। कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारी ज़िंदगी में कुछ लोग मिलने के लिए नहीं आते, सिर्फ़ याद बन जाने के लिए आते हैं। वे आते हैं, कुछ लम्हों के लिए हमारी रूह में ठहरते हैं, और फिर किसी अनजाने मौसम की तरह गुज़र जाते हैं। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी आहट बरसों तक दिल के दरवाज़ों पर सुनाई देती रहती है। अजीब बात है— जो रिश्ते मुकम्मल हो जाते हैं, वे धीरे-धीरे ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं। मगर जो मुकम्मल नहीं हो पाते, वे अफ़साना बन जाते हैं। मुझे याद नहीं कि वह आख़िरी मुलाक़ात थी या पहली जुदाई। बस इतना याद है कि उसकी आँखों में कुछ अनकहे अल्फ़ाज़ ठहरे हुए थे और मेरे होंठों पर कुछ अधूरे जुमले। हम दोनों ने...

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, द्वादश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन

भगवद्गीता प्रथम अध्याय, द्वादश श्लोक : एक शोधपूर्ण, रोचक, वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विवेचन मूल श्लोक - तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः । सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ १.१२ ॥ अन्वय - तस्य हर्षं सञ्जनयन् कुरुवृद्धः प्रतापवान् पितामहः भीष्मः उच्चैः सिंहनादं विनद्य शङ्खं दध्मौ। सामान्य हिन्दी अर्थ तब कुरुवंश के वृद्ध, प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हर्ष को बढ़ाते हुए सिंह के समान गर्जना करके ऊँचे स्वर से अपना शंख बजाया। महाभारत का पहला शंख किसने बजाया? सामान्यतः लोगों को लगता है कि गीता का प्रारम्भ श्रीकृष्ण के पंचजन्य शंख से हुआ होगा। किन्तु आश्चर्य की बात है कि गीता में सबसे पहला शंख श्रीकृष्ण नहीं, भीष्म बजाते हैं। यह कोई संयोग नहीं है। व्यास मानव-चेतना का एक गहरा नियम बता रहे हैं—  युद्ध का आरम्भ शस्त्रों से नहीं, ध्वनि से होता है। हर संघर्ष पहले विचार में जन्म लेता है। फिर शब्द बनता है। फिर कर्म बनता है। भीष्म का शंख उसी प्रथम कम्पन (First Vibration) का प्रतीक है। 1. "तस्य सञ्जनयन् हर्षम्" — भीष्म किसका उत्साह बढ़ा रहे हैं? यहाँ "तस्य" शब...