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Monday, 1 June 2026

आत्मपूजोपनिषद् और ईशावास्योपनिषद् : एक विवेचनात्मक अध्ययन

आत्मपूजोपनिषद् और ईशावास्योपनिषद् : एक विवेचनात्मक अध्ययन

उपनिषद्-साहित्य भारतीय आध्यात्मिक चिन्तन की वह धारा है जिसमें मनुष्य, जगत् और परमात्मा के सम्बन्ध को अत्यन्त गम्भीरता और सूक्ष्मता के साथ समझने का प्रयास किया गया है। प्रत्येक उपनिषद् अपने ढंग से ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन करता है, किन्तु सभी का अन्तिम लक्ष्य आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति है। ईशावास्योपनिषद् और आत्मपूजोपनिषद् दो ऐसे उपनिषद् हैं जो आकार और शैली में भिन्न होने पर भी अपने मूल उद्देश्य में एक-दूसरे के पूरक दिखाई देते हैं। ईशावास्योपनिषद् जहाँ सम्पूर्ण जगत् में ईश्वर की उपस्थिति का उद्घोष करता है, वहीं आत्मपूजोपनिषद् उसी ईश्वर को साधक के अन्तःकरण में प्रतिष्ठित करके उसकी उपासना की आन्तरिक पद्धति प्रस्तुत करता है।

यदि ईशावास्योपनिषद् हमें यह सिखाता है कि “सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से व्याप्त है”, तो आत्मपूजोपनिषद् हमें यह अनुभव कराता है कि “वह ईश्वर मेरे अपने आत्मस्वरूप में ही विद्यमान है।” इस दृष्टि से दोनों उपनिषद् एक ही सत्य के दो परस्पर सम्बद्ध आयाम प्रस्तुत करते हैं।

ईशावास्योपनिषद् का मूल प्रतिपाद्य

ईशावास्योपनिषद् का प्रथम मन्त्र सम्पूर्ण उपनिषद् का सार माना जाता है—

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।

अर्थात् इस जगत् में जो कुछ भी गतिशील अथवा स्थिर है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है।

यह मन्त्र मनुष्य को यह दृष्टि प्रदान करता है कि संसार कोई ईश्वर-विहीन वस्तु नहीं है। प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक जीव और प्रत्येक अनुभव के भीतर वही परम सत्ता विद्यमान है। इसलिए संसार के प्रति आसक्ति नहीं, बल्कि ईश्वर-दृष्टि विकसित करनी चाहिए। यही कारण है कि उपनिषद् आगे त्यागपूर्वक भोग करने तथा लोभ से दूर रहने का उपदेश देता है।

ईशावास्योपनिषद् का सम्पूर्ण चिन्तन इस बात पर केन्द्रित है कि मनुष्य संसार में रहते हुए भी उससे बँधे नहीं। कर्म करे, किन्तु कर्मफल में आसक्त न हो। भोग करे, किन्तु स्वामित्व का अहंकार न रखे। यही उपनिषद् का कर्म और ज्ञान का समन्वित मार्ग है।

आत्मपूजोपनिषद् का मूल प्रतिपाद्य

आत्मपूजोपनिषद् का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत अधिक अन्तर्मुखी है। यहाँ जगत् की चर्चा कम और साधक की आन्तरिक साधना की चर्चा अधिक मिलती है। यह उपनिषद् बाह्य पूजा की समस्त सामग्रियों और विधियों को आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करता है।

उदाहरणार्थ—

  • आत्मचिन्तन को ध्यान कहा गया है।
  • कर्तृत्वभाव के त्याग को आवाहन कहा गया है।
  • स्थिर ज्ञान को आसन कहा गया है।
  • आत्मचैतन्य को दीप कहा गया है।
  • “सोऽहम्” भाव को नमस्कार कहा गया है।
  • सन्तोष को विसर्जन कहा गया है।

इस प्रकार आत्मपूजोपनिषद् का उद्देश्य साधक को यह समझाना है कि वास्तविक पूजा बाहर नहीं, भीतर घटित होती है। आत्मा का साक्षात्कार ही पूजा की चरम परिणति है।

दोनों उपनिषदों में ईश्वर की अवधारणा

ईशावास्योपनिषद् और आत्मपूजोपनिषद् दोनों ईश्वर को सर्वव्यापक मानते हैं, किन्तु उनकी प्रस्तुति में भिन्नता दिखाई देती है।

ईशावास्योपनिषद् का आरम्भ विश्व-दृष्टि से होता है। वह कहता है कि सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से आच्छादित है। उसकी दृष्टि बाहर से भीतर की ओर चलती है। साधक पहले जगत् में ईश्वर को देखता है और फिर आत्मा में।

इसके विपरीत आत्मपूजोपनिषद् भीतर से बाहर की ओर चलता है। वह आत्मा को ही पूजा का केन्द्र बनाता है और साधक को अपने अन्तःकरण में स्थित चैतन्य का बोध कराता है।

अर्थात् ईशावास्योपनिषद् का मार्ग “विश्व से आत्मा” की ओर है, जबकि आत्मपूजोपनिषद् का मार्ग “आत्मा से विश्व” की ओर है।

त्याग और वैराग्य की भावना

ईशावास्योपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य है—

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा।

अर्थात् त्याग की भावना के साथ जीवन का उपभोग करो।

यहाँ त्याग का अर्थ संसार का परित्याग नहीं, बल्कि स्वामित्व-बुद्धि का त्याग है। मनुष्य वस्तुओं का उपयोग करे, किन्तु उन्हें अपना न माने।

आत्मपूजोपनिषद् में भी यही भाव एक भिन्न रूप में दिखाई देता है। वहाँ “सर्वकर्मनिराकरणम् आवाहनम्” कहकर कर्तृत्वाभिमान के त्याग पर बल दिया गया है। जब तक मनुष्य अपने को कर्ता मानता है, तब तक वह बन्धन में रहता है। अतः दोनों उपनिषद् अहंकार और आसक्ति के त्याग को आध्यात्मिक जीवन का आधार मानते हैं।

ज्ञान की भूमिका

दोनों उपनिषदों में ज्ञान का अत्यन्त महत्त्व है।

ईशावास्योपनिषद् विद्या और अविद्या के समन्वय की चर्चा करते हुए बताता है कि केवल कर्म या केवल बौद्धिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को ऐसा ज्ञान प्राप्त करना चाहिए जो उसे मृत्यु से पार ले जाए और अमृतत्व की ओर अग्रसर करे।

आत्मपूजोपनिषद् में भी ज्ञान को पूजा का मूल तत्त्व माना गया है। वहाँ ज्ञान ही पुष्प है, ज्ञान ही धूप है और ज्ञान ही दीप है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मज्ञान के बिना पूजा केवल बाह्य क्रिया बनकर रह जाती है।

अद्वैत की स्थापना

दोनों उपनिषदों का अन्तिम निष्कर्ष अद्वैत की स्थापना है।

ईशावास्योपनिषद् कहता है—

यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः।

अर्थात् ज्ञानी पुरुष के लिए सभी प्राणी आत्मस्वरूप हो जाते हैं।

जब सबमें एक ही आत्मा दिखाई देने लगती है, तब द्वेष, भय और शोक समाप्त हो जाते हैं।

आत्मपूजोपनिषद् इसी सत्य को “सोऽहंभावो नमस्कारः” के रूप में व्यक्त करता है। जब साधक यह अनुभव कर लेता है कि वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप है, तब उपासक और उपास्य का भेद समाप्त हो जाता है।

इस प्रकार दोनों उपनिषद् अद्वैत वेदान्त की उसी महान् अनुभूति की ओर संकेत करते हैं जहाँ केवल एक ही सत्य शेष रह जाता है।

व्यावहारिक दृष्टि से दोनों उपनिषदों का महत्त्व

आधुनिक जीवन में ईशावास्योपनिषद् हमें यह सिखाता है कि संसार को केवल उपभोग की वस्तु न मानकर ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखें। इससे पर्यावरण, समाज और मानवता के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।

दूसरी ओर आत्मपूजोपनिषद् हमें आत्मनिरीक्षण, अन्तर्मुखता और आत्मबोध की प्रेरणा देता है। यह बताता है कि शान्ति और आनन्द बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित आत्मा की पहचान में निहित हैं।

इस प्रकार एक उपनिषद् जीवन-दृष्टि प्रदान करता है और दूसरा साधना-दृष्टि।

ईशावास्योपनिषद् और आत्मपूजोपनिषद् दोनों मिलकर उपनिषद्-दर्शन की एक पूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। ईशावास्योपनिषद् हमें जगत् में ईश्वर का दर्शन कराता है, जबकि आत्मपूजोपनिषद् हमें अपने भीतर उसी ईश्वर का अनुभव कराता है। एक बाह्य जगत् को ईश्वरमय बनाता है, दूसरा अन्तःकरण को ब्रह्ममय बनाता है। एक त्याग, समत्व और कर्मयोग की शिक्षा देता है, तो दूसरा आत्मनिष्ठा, आत्मोपासना और आत्मज्ञान का मार्ग दिखाता है।

अन्ततः दोनों उपनिषद् एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं—ईश्वर और आत्मा में कोई भेद नहीं है। जो सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है, वही प्रत्येक मनुष्य के हृदय में आत्मरूप से विद्यमान है। उस सत्य का साक्षात्कार ही उपनिषदों का लक्ष्य, साधना का सार और जीवन की परम सिद्धि है।

मुकेश ,,,,,,,,,

आत्मपूजोपनिषद् : आत्मा की पूजा का अद्भुत उपनिषद्

 आत्मपूजोपनिषद् : आत्मा की पूजा का अद्भुत उपनिषद्

 

भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में पूजा का अत्यन्त महत्त्व है। सामान्यतः हम पूजा को मन्दिर, मूर्ति, दीपक, धूप, पुष्प और नैवेद्य आदि से जोड़कर देखते हैं। किन्तु आत्मपूजोपनिषद् हमें एक बिल्कुल नई दृष्टि प्रदान करता है। यह उपनिषद् बताता है कि पूजा केवल बाहरी वस्तुओं से नहीं होती, बल्कि अपने भीतर स्थित आत्मा के प्रति जागरूक होकर भी की जा सकती है। इस उपनिषद् में पूजा की प्रत्येक सामग्री और प्रत्येक क्रिया का आन्तरिक एवं आध्यात्मिक अर्थ बताया गया है। यहाँ साधक को यह शिक्षा दी जाती है कि आत्मा ही पूज्य है, आत्मा ही पूजा है और अन्ततः आत्मा ही परमात्मा है।


. तस्य निश्चिन्तनं ध्यानम्

अर्थ आत्मा का निरन्तर चिन्तन करना ही ध्यान है।

हम सामान्यतः ध्यान का अर्थ आँखें बन्द करके बैठना समझते हैं। किन्तु इस उपनिषद् के अनुसार ध्यान का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप को याद रखना। जैसे कोई व्यक्ति दिन-रात अपने प्रिय व्यक्ति को याद करता है, वैसे ही साधक को अपने भीतर स्थित आत्मा का स्मरण करना चाहिए। आत्मा का निरन्तर चिन्तन ही सच्चा ध्यान है।


. सर्वकर्मनिराकरणमावाहनम्

अर्थ सभी कर्मों के कर्तापन का त्याग ही आवाहन है।

पूजा में हम देवता का आवाहन करते हैं अर्थात् उन्हें बुलाते हैं। परन्तु जो ईश्वर हर जगह मौजूद है, उसे बुलाने की आवश्यकता ही क्या है? उपनिषद् कहता है कि जब मनुष्य यह अहंकार छोड़ देता है कि "सब कुछ मैं ही कर रहा हूँ", तभी ईश्वर का वास्तविक आवाहन होता है।


. निश्चलज्ञानमासनम्

अर्थ स्थिर ज्ञान ही आसन है।

सिर्फ शरीर को स्थिर करके बैठ जाना पर्याप्त नहीं है। मन और बुद्धि भी स्थिर होनी चाहिए। जब हमारा मन संसार की उलझनों से हटकर आत्मा में टिक जाता है, तभी सच्चे आसन की प्राप्ति होती है।


. समुन्मनीभावः पाद्यम्

अर्थ मन के शान्त और ऊर्ध्वगामी हो जाने की अवस्था ही पाद्य है।

जिस प्रकार पूजा में देवता के चरण धोए जाते हैं, उसी प्रकार साधक को अपने मन को विकारों से धोना चाहिए। जब मन शान्त होकर आत्मा की ओर मुड़ता है, तब वही वास्तविक पाद्य है।


. सदामनस्कमर्घ्यम्

अर्थ सदा आत्मा में स्थित रहने वाला मन ही अर्घ्य है।

अर्घ्य सम्मान का प्रतीक है। आत्मा को सबसे बड़ा सम्मान यही है कि हमारा मन बार-बार संसार में भटकने के बजाय आत्मा में स्थिर रहे।


. सदादीप्तिराचमनीयम्

अर्थ आत्मा की नित्य प्रकाशित चेतना ही आचमन है।

आचमन शुद्धि का प्रतीक है। उपनिषद् कहता है कि वास्तविक शुद्धि जल से नहीं, बल्कि आत्मा के प्रकाश को पहचानने से होती है।


. वराकृतप्राप्तिः स्नानम्

अर्थ श्रेष्ठतम स्वरूप अर्थात् ब्रह्म की प्राप्ति ही स्नान है।

शरीर को पानी से धोने से बाहरी स्वच्छता आती है। लेकिन आत्मज्ञान से भीतर की अशुद्धियाँ दूर होती हैं। इसलिए आत्मा का ज्ञान ही वास्तविक स्नान है।


. सर्वात्मकत्वं दृश्यविलयो गन्धः

अर्थ सबमें एक ही आत्मा का दर्शन करना ही गन्ध है।

जब हमें हर व्यक्ति, हर जीव और हर वस्तु में उसी परमात्मा का दर्शन होने लगे, तब यही आध्यात्मिक सुगन्ध है। यही इस मन्त्र का सन्देश है।


. दृगविशिष्टात्मानः अक्षताः

अर्थ साक्षीस्वरूप आत्मा का ज्ञान ही अक्षत है।

अक्षत अर्थात् जो टूटता नहीं। आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। अपने भीतर उस अमर आत्मा को पहचान लेना ही सच्चा अक्षत अर्पण करना है।


१०. चिदादीप्तिः पुष्पम्

अर्थ चेतना का प्रकाश ही पुष्प है।

फूल कुछ समय बाद मुरझा जाते हैं, लेकिन आत्मा का प्रकाश कभी नष्ट नहीं होता। इसलिए ज्ञान और चेतना का प्रकाश ही सबसे सुन्दर पुष्प है।


११. चिदाग्निस्वरूपं धूपः

अर्थ ज्ञानरूपी अग्नि ही धूप है।

धूप वातावरण को सुगन्धित करती है। उसी प्रकार ज्ञान हमारे जीवन से अज्ञान और भ्रम को दूर कर देता है। इसलिए ज्ञान की अग्नि ही वास्तविक धूप है।


१२. चिदादित्यस्वरूपं दीपः

अर्थ चेतना का सूर्यस्वरूप प्रकाश ही दीप है।

दीपक अन्धकार दूर करता है। उसी प्रकार आत्मज्ञान जीवन के अज्ञानरूपी अन्धकार को मिटा देता है। इसलिए आत्मा ही सच्चा दीपक है।


१३. परिपूर्णचन्द्रामृतरसैकीकरणं नैवेद्यम्

अर्थ पूर्ण आनन्द में एक हो जाना ही नैवेद्य है।

सामान्य पूजा में भोजन अर्पित किया जाता है। परन्तु आत्मपूजा में अपने आपको परम आनन्द में समर्पित कर देना ही नैवेद्य है।


१४. निश्चलत्वं प्रदक्षिणम्

अर्थ आत्मा में अटल बने रहना ही प्रदक्षिणा है।

जो परमात्मा हर जगह है, उसकी परिक्रमा कैसे की जा सकती है? इसलिए आत्मा में स्थिर रहना ही वास्तविक प्रदक्षिणा है।


१५. सोऽहंभावो नमस्कारः

अर्थवह परमात्मा मैं हूँ” — यह भाव ही नमस्कार है।

यह आत्मपूजोपनिषद् का सबसे महत्त्वपूर्ण मन्त्र है। जब साधक यह अनुभव कर लेता है कि आत्मा और परमात्मा अलग नहीं हैं, तभी सच्चा नमस्कार होता है।


१६. मौनं स्तुतिः

अर्थ मौन ही स्तुति है।

कुछ सत्य ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। परमात्मा भी ऐसा ही सत्य है। इसलिए उसके प्रति सबसे बड़ी स्तुति मौन है।


१७. सन्तोषो विसर्जनम्

अर्थ पूर्ण सन्तोष ही विसर्जन है।

जब आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब मनुष्य की सभी खोज समाप्त हो जाती हैं। उसे भीतर से पूर्ण शान्ति और तृप्ति मिलती है। यही पूजा का वास्तविक समापन है।


आत्मपूजोपनिषद् हमें एक अत्यन्त सुन्दर और गहरी शिक्षा देता है। यह बताता है कि पूजा केवल मन्दिरों में नहीं होती, बल्कि अपने भीतर भी की जा सकती है। यहाँ पुष्प का अर्थ ज्ञान है, दीप का अर्थ आत्मचेतना है, धूप का अर्थ विवेक है और नमस्कार का अर्थ आत्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव है। इस प्रकार यह उपनिषद् हमें बाहरी साधनों से आगे बढ़कर अपने भीतर झाँकने की प्रेरणा देता है। उसका सन्देश अत्यन्त सरल हैयदि आत्मा को जान लिया, तो पूजा पूर्ण हो गई; यदि आत्मा को पहचान लिया, तो परमात्मा को पा लिया।

 

मुकेश ,,,,,,,,,

अयमात्मा ब्रह्म" — यदि जागना ही पर्याप्त न हो तो?

 

अयमात्मा ब्रह्म" — यदि जागना ही पर्याप्त न हो तो?

कभी-कभी मुझे लगता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यह नहीं कि वह संसार को सत्य मानता है।

उसका सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को जागा हुआ मानता है।

सुबह आँख खुलती है।

हम बिस्तर से उठते हैं।

अपने नाम को पहचानते हैं।

अपने संबंधों को याद करते हैं।

और तुरंत मान लेते हैं कि अब हम जाग गए हैं।

लेकिन माण्डूक्य उपनिषद् एक असहज प्रश्न पूछता है—

क्या सचमुच?


रात को स्वप्न में भी तो यही होता है।

वहाँ भी एक "मैं" होता है।

एक संसार होता है।

सुख-दुःख होते हैं।

भय और आशाएँ होती हैं।

और स्वप्न के भीतर हमें कभी संदेह नहीं होता कि यह सब वास्तविक है।

फिर एक दूसरी जागृति आती है और पूरा स्वप्न विलीन हो जाता है।

अब प्रश्न यह है—

क्या यह जाग्रत संसार भी किसी और जागृति की प्रतीक्षा में है?


माण्डूक्य उपनिषद् मनुष्य के अनुभव को तीन भागों में नहीं, चार भागों में देखता है।

जाग्रत।

स्वप्न।

सुषुप्ति।

और फिर...

तुरीय।

यहीं से दर्शन कविता बन जाता है।

और कविता मौन।


जाग्रत अवस्था में मैं संसार देखता हूँ।

स्वप्न में मैं अपना संसार रचता हूँ।

सुषुप्ति में दोनों लुप्त हो जाते हैं।

लेकिन इन तीनों में एक चीज़ समान रहती है।

कोई है जो इन तीनों का साक्षी है।

जिसने बचपन भी देखा।

युवावस्था भी देखी।

स्वप्न भी देखे।

गहरी नींद भी जानी।

और अब यह सब पढ़ भी रहा है।

वह कौन है?


माण्डूक्य का सारा रहस्य इसी प्रश्न में छिपा है।

उपनिषद् कहता है—

तुम जाग्रत व्यक्ति नहीं हो।

तुम स्वप्न देखने वाले भी नहीं हो।

तुम वह अंधकार भी नहीं हो जिसमें सब कुछ डूब जाता है।

तुम वह हो जिसके कारण ये तीनों संभव हैं।

जैसे परदे के कारण चलचित्र दिखाई देता है।

परदा किसी दृश्य का हिस्सा नहीं होता।

न युद्ध उसका है।

न प्रेम उसका।

न जन्म उसका।

न मृत्यु उसकी।

फिर भी उसके बिना कोई दृश्य संभव नहीं।


तुरीय कोई चौथी अवस्था नहीं है।

क्योंकि चौथी अवस्था भी आएगी और जाएगी।

तुरीय तो वह है जो तीनों अवस्थाओं में सदैव उपस्थित है।

जैसे आकाश।

बादल बदलते रहते हैं।

आकाश नहीं।

दिन आता है।

रात आती है।

आकाश नहीं बदलता।

जाग्रत आता है।

स्वप्न आता है।

सुषुप्ति आती है।

साक्षी नहीं बदलता।


और तब माण्डूक्य की महान उद्घोषणा सुनाई देती है—

"अयमात्मा ब्रह्म।"

यह आत्मा ही ब्रह्म है।

कोई दूरी नहीं।

कोई यात्रा नहीं।

कोई पुल नहीं।

जिसे खोज रहे हो, वही खोज रहा है।

जिसे पाना चाहते हो, वही पाने की इच्छा कर रहा है।

जिसे ब्रह्म कहते हो, वही अभी इस क्षण "मैं" कहकर स्वयं को सीमित समझ रहा है।


कितना विचित्र है।

समुद्र स्वयं को एक लहर समझकर भयभीत है।

आकाश स्वयं को एक बादल समझकर रो रहा है।

प्रकाश स्वयं को एक किरण समझकर अकेला महसूस कर रहा है।

और माण्डूक्य उपनिषद् धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखकर कहता है—

"तुम्हारी समस्या संसार नहीं है।

तुम्हारी समस्या विस्मृति है।"


शायद आध्यात्मिकता का अंतिम क्षण किसी दिव्य अनुभव में नहीं आता।

वह तब आता है जब पहली बार यह स्पष्ट हो जाता है कि मैं कभी बंधा ही नहीं था।

जिस मुक्ति की खोज थी, वह स्वप्न के पात्र की खोज थी।

साक्षी तो सदैव मुक्त था।

सदैव पूर्ण।

सदैव शांत।

और तब शब्द धीरे-धीरे रुक जाते हैं।

विचार भी।

केवल एक असीम, अनाम उपस्थिति रह जाती है।

माण्डूक्य उसे तुरीय कहता है।

ऋषि उसे आत्मा कहते हैं।

वेदांत उसे ब्रह्म कहता है।

और मौन...

वह उसे कोई नाम नहीं देता।

मुकेश ,,,,,,,

शायद संसार कभी बना ही नहीं

 शायद संसार कभी बना ही नहीं

यह विचार पहली बार सुनने में लगभग असंभव लगता है।

हम इस मेज़ को छू सकते हैं।

इस शरीर को महसूस कर सकते हैं।

दुख, सुख, भूख, प्यास—सबका अनुभव कर सकते हैं।

फिर कोई कैसे कह सकता है कि संसार वास्तव में उत्पन्न ही नहीं हुआ?

लेकिन अद्वैत की सबसे साहसी घोषणाओं में से एक यही है।

"न निरोधो न चोत्पत्तिः..."

न कुछ नष्ट होता है, न कुछ उत्पन्न होता है।

गौड़पाद इसे अजातिवाद कहते हैं।

अर्थात्—जन्म कभी हुआ ही नहीं।

एक रात मैंने स्वप्न देखा।

उस स्वप्न में एक पूरा नगर था।

लोग थे।

रास्ते थे।

मिलन था।

वियोग था।

आशाएँ थीं।

भय थे।

और स्वप्न के भीतर यह सब बिल्कुल वास्तविक था।

स्वप्न का सूर्य भी उग रहा था।

स्वप्न की रात भी उतर रही थी।

स्वप्न के लोग भी अपने-अपने दुख लेकर जी रहे थे।

लेकिन आँख खुलते ही क्या हुआ?

क्या वह नगर नष्ट हो गया?

या यह कहना अधिक ठीक होगा कि वह कभी बना ही नहीं था?


अद्वैत यहीं एक विस्फोटक बात कहता है।

जिस प्रकार स्वप्न जागरण की दृष्टि से असत्य है, उसी प्रकार यह जाग्रत जगत भी किसी और स्तर की जागृति से देखा जाए तो वैसा नहीं रह जाता जैसा अभी दिखाई देता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि संसार का अनुभव झूठा है।

अनुभव हो रहा है।

लेकिन उसकी व्याख्या अधूरी है।


हम लहरों को देखते हैं और कहते हैं—"लहर पैदा हुई।"

समुद्र कहता है—"जल के अतिरिक्त कुछ भी पैदा नहीं हुआ।"

हम कहते हैं—"यह आभूषण बना।"

सोना कहता है—"मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं बना।"

हम कहते हैं—"यह संसार उत्पन्न हुआ।"

ब्रह्म शायद मुस्कुराकर कहता होगा—

"मेरे अतिरिक्त कब कुछ था?"


शायद इसी कारण ऋषियों ने सृष्टि के रहस्य से अधिक चेतना के रहस्य में रुचि ली।

उन्हें यह जानना नहीं था कि संसार कब बना।

उन्हें यह देखना था कि जो इसे बना हुआ देख रहा है, वह कौन है।

क्योंकि यदि द्रष्टा का रहस्य खुल जाए, तो दृश्य का रहस्य अपने-आप खुलने लगता है।


कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जीवन को बहुत गंभीरता से लेते हैं।

इतनी गंभीरता से कि खेल को भी युद्ध बना देते हैं।

भूमिकाओं को पहचान बना लेते हैं।

क्षणों को अनंत समझ बैठते हैं।

जबकि अस्तित्व शायद उतना गंभीर नहीं है।

एक बालक समुद्र किनारे रेत का घर बनाता है।

थोड़ी देर बाद स्वयं ही उसे गिरा देता है।

न बनाते समय दुखी होता है।

न मिटाते समय।

क्योंकि उसे पता है कि वह घर नहीं है।

वह केवल खेल रहा है।


शायद ज्ञानी और अज्ञानी के बीच सबसे बड़ा अंतर ज्ञान का नहीं, गंभीरता का है।

अज्ञानी अपने स्वप्न को अंतिम सत्य मान बैठता है।

ज्ञानी स्वप्न को नकारता नहीं, लेकिन उसकी प्रकृति जानता है।

वह प्रेम करता है, मगर चिपकता नहीं।

वह कार्य करता है, मगर बँधता नहीं।

वह जीता है, मगर हर क्षण जानता है कि जो दिखाई दे रहा है, उसकी वास्तविकता वैसी नहीं है जैसी प्रतीत होती है।


और तब एक दिन एक अजीब संभावना जन्म लेती है।

क्या हो यदि मैं इस संसार में एक व्यक्ति की तरह नहीं, एक स्वप्नद्रष्टा की तरह जीना शुरू करूँ?

क्या हो यदि मैं हर घटना के पीछे यह स्मरण बनाए रखूँ कि दृश्य बदलते रहते हैं, पर देखने वाली चेतना नहीं?

क्या हो यदि जन्म और मृत्यु भी उसी महान स्वप्न के दृश्य हों?

तब शायद पहली बार भय थोड़ा ढीला पड़े।

और जहाँ भय ढीला पड़ता है,

वहीं से अद्वैत अपनी सबसे सूक्ष्म फुसफुसाहट शुरू करता है

"तुम संसार में नहीं हो।
संसार तुममें प्रकट हो रहा है।"

मुकेश ,,,,,,,