चिंतन - क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है?
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चिंतन - क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है?
मनुष्य ने बोलना बहुत पहले सीख लिया था, पर मौन को पढ़ना आज तक नहीं सीख पाया।
शब्दों का अपना व्याकरण है, अपना कोश है, अपना इतिहास है; किंतु मौन का कोई शब्दकोश नहीं। उसे किसी भाषा में नहीं बाँधा जा सकता। वह लिखा कम जाता है, जिया अधिक जाता है। शायद इसीलिए मैं कभी-कभी सोचता हूँ—क्या मौन भी भीतर का एक शास्त्र है? ऐसा शास्त्र, जिसे पढ़ने के लिए आँखों से अधिक अंतःकरण की आवश्यकता होती है।
हमने ज्ञान को प्रायः शब्दों में खोजा है। ग्रंथ लिखे, भाष्य रचे, वाद-विवाद किए। किंतु क्या यह विचित्र नहीं कि सबसे बड़ी अनुभूतियाँ शब्दों के समाप्त होने पर ही घटित होती हैं? प्रेम अपने चरम पर पहुँचकर चुप हो जाता है। शोक अपनी गहराई में पहुँचकर रोना भी छोड़ देता है। प्रार्थना अपने शुद्धतम रूप में शब्दों की याचना नहीं रहती, केवल एक मौन उपस्थिति बन जाती है।
मानो शब्द यात्रा हों और मौन गंतव्य।
मौन को अक्सर लोग अनुपस्थिति समझ लेते हैं। जैसे कुछ न कहना, कुछ न होना। परंतु मौन रिक्तता नहीं, परिपूर्णता भी हो सकता है। जिस प्रकार आकाश खाली दिखाई देता है, जबकि उसी में समूचा ब्रह्मांड समाया है; उसी प्रकार मौन भी बाहर से निस्पंद दिखता है, जबकि भीतर अनगिनत अर्थों का आवागमन चलता रहता है।
शायद इसलिए भारतीय परंपरा में ऋषि जितना बोलते थे, उससे अधिक मौन रहते थे। उन्हें ज्ञात था कि सत्य को केवल कहा नहीं जा सकता; उसे धारण भी करना पड़ता है। शब्द केवल संकेत हैं, सत्य नहीं। उँगली चंद्रमा की ओर इशारा कर सकती है, स्वयं चंद्रमा नहीं बन सकती।
मौन वही चंद्रमा है।
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि लोग बहुत बोलते हैं; बल्कि यह है कि लोग बोलकर भी संवाद नहीं करते। शब्द बढ़ते गए, अर्थ घटते गए। ध्वनियाँ बढ़ीं, श्रवण कम हो गया। आज हर व्यक्ति अपनी बात कहने के लिए व्याकुल है, पर दूसरे की चुप्पी सुनने का धैर्य बहुत कम लोगों में बचा है।
शायद इसीलिए संबंध थकने लगे हैं।
दो मनुष्यों के बीच प्रेम को शब्दों से अधिक मौन बचाता है। मित्रता का सबसे विश्वसनीय क्षण वह होता है, जब दो मित्र बिना कुछ कहे साथ बैठे रह सकते हैं। माता की गोद में सोया हुआ शिशु किसी भाषा को नहीं जानता, फिर भी वह सबसे गहरा संवाद कर रहा होता है। वहाँ कोई वाक्य नहीं, केवल विश्वास है।
विश्वास हमेशा मौन की भाषा में लिखा जाता है।
लेकिन मौन का भी एक अनुशासन है। हर चुप्पी मौन नहीं होती। भय की चुप्पी अलग है, अहंकार की चुप्पी अलग, उपेक्षा की चुप्पी अलग। इन चुप्पियों में संवाद मर जाता है। पर जिस मौन की मैं बात कर रहा हूँ, वह जीवित है। उसमें करुणा है, जागरूकता है, ग्रहणशीलता है। वह उत्तर देने की जल्दी में नहीं होता; वह पहले सुनता है।
सुनना भी एक साधना है।
ध्यान की परंपराएँ इसलिए मौन को महत्त्व देती हैं कि मनुष्य पहली बार अपने भीतर के कोलाहल से परिचित हो सके। बाहर का शोर तो बंद कर देना सरल है; भीतर का शोर वर्षों तक बोलता रहता है। इच्छाएँ बोलती हैं, स्मृतियाँ बोलती हैं, आशंकाएँ बोलती हैं, अहंकार बोलता है। जब यह सब धीरे-धीरे शांत होने लगता है, तब जो बचता है, वही मौन है।
और वही शायद आत्मा का पहला अक्षर है।
मुझे लगता है, जीवन की सबसे बड़ी भूलों में से एक यह है कि हम हर प्रश्न का उत्तर तुरंत देना चाहते हैं। जबकि कुछ प्रश्नों का उत्तर शब्द नहीं, समय देता है। और समय भी उत्तर नहीं देता; वह हमें इतना परिपक्व कर देता है कि प्रश्न स्वयं बदल जाता है।
यह परिवर्तन मौन में ही संभव है।
बीज यदि हर क्षण बोलता रहता, तो अंकुरित कैसे होता? पृथ्वी यदि अपनी हर हरकत का शोर करती, तो ऋतुएँ कैसे बदलतीं? ब्रह्मांड का अधिकांश विस्तार निःशब्द है। सृष्टि का सबसे विराट कार्य मौन में घटित होता है। शायद इसलिए मनुष्य का सबसे गहरा रूपांतरण भी भीतर ही भीतर होता है, बिना किसी उद्घोषणा के।
मौन हमें छोटा नहीं बनाता; वह हमारे भीतर की अनावश्यक भीड़ को कम करता है। वह अहंकार की अतिरिक्त पंक्तियाँ मिटा देता है। वह हमें दूसरों से पहले स्वयं के सामने उपस्थित करता है।
और जो मनुष्य अपने ही सामने उपस्थित हो गया, उसे संसार से छिपने की आवश्यकता नहीं रहती।
इसलिए अब मुझे लगता है कि मौन केवल बोलने का अभाव नहीं है। वह एक शास्त्र है—जिसके सूत्र लिखे नहीं जाते, अनुभव किए जाते हैं; जिसकी परीक्षाएँ बाहर नहीं, भीतर होती हैं; और जिसकी उपाधि किसी विश्वविद्यालय से नहीं, जीवन से मिलती है।
शब्द हमें विद्वान बना सकते हैं, पर मौन हमें साक्षी बनाता है।
और संभवतः साक्षी होना ही मनुष्य होने की सबसे ऊँची शिक्षा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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