थिर और उदास नदी थीं तुम तुम्हारी आँखों के कोर डबडबाए रहते थे तुम्हे अँधेरा कमरा सूनी दीवारें अच्छी लगती थीं दर्द भरे नग्मे गुनगुनाया करती थीं तुम मेरी बातें गौर से सुनती थीं मै तुम्हे ज़बरदस्ती रोशनी में ले जाया करता तुम्हे हंसाने की कोशिश करता तुम मुस्कुरा के रह जातीं मेरे लतीफों पे मैं तुम्हे गुदगुदाना चाहता तुम परे खिसक जातीं मै कुछ पूछता तुम टाल जाती मैंने ये भी पूछा "तुम्हारा कोई और दोस्त तो नहीं .... ?" तुमने "पागल हो क्या ? " कह के बात को टाल दिया था पर एक दिन मैंने तुम्हारी चुप्पी को पढ़ लिया तुम्हारी आँखों की पुतलियों में सजे सपने देख लिए जिसमे एक खूबसूरत और समवयस्क राजकुमार मुस्कुरा रहा था, उसके बाजुओं की मछलियाँ टी शर्ट से झाँकती हुई किसी स्त्री को आकर्षित कर सकती थी राज कुमार घोड़े पे सवार था उसके पास बाहु बल और धन बल भी था उसका नाम लेते ही तुम्हारा चेहरा खिल उठता अब तुम उदास गीत नहीं गुनगुनाती थी अब तुम मुझसे अपना हर सुख दुःख भी नहीं साझा करती थीं अब तुम बहुत सी बातों को टाल जातीं मै जिद करता तो कहतीं थी "पागल हो क्या ,,,?" खैर अब तुम्हारा ये प...