यमुना की गहराई गँगा सी रवानी है

यमुना की गहराई गँगा सी रवानी है
लगता है तू परी कोई आसमानी है

झटक दो गेसू फ़िज़ाएं महक जाती हैं
तेरे वज़ूद में चंपा चमेली रातरानी है

होठ नज़्म गेसू ग़ज़ल आँखे रुबाई है
तेरी हर अदा हर बात इक कहानी है

चंद लम्हे को सही मुलाकात तो कर
ढेरों बातें हैं जो मुझे तुझको सुनानी है

जब कभी खल्वत में बैठ के सोचता हूँ
तू मेरी रूह मेरी साँस मेरी ज़िंदगानी है

मुकेश इलाहाबादी ----------------

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