तुम खिलखिलाओ मै तुम्हे देखूँ

तुम खिलखिलाओ मै तुम्हे देखूँ
मेरे पास बैठो और तुम्हे मह्सूसूँ
किसी रोज़ अपनी चुप्पी तो तोड़ो
तुम बोलो और तुम्हे देर तक सुनूँ
अपनी हिरणी सी आँखें ले के आ
तुझको जी भर देखूँ गज़ल लिखूँ
ज़िंदगी कुछ पल मोहलत दे तो
खल्वत में बैठूँ सिर्फ तुझे सोंचू
मुकेश बेतरह जल रहा कब से मै
कभी तो बदल सा बरस मै भीगूँ
मुकेश इलाहाबादी -----------

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