घाव नहीं दिखता पर दर्द रिसता है

घाव नहीं दिखता पर दर्द रिसता है
कोई अपना रूठता है तो टीसता है

आसमान ही नहीं ज़मी भी रोती है
गर फ़लक़ पे कोई सितारा टूटता है

ये सच है वक़्त हर घाव भर देता है
ये भी सच है ज़ख्मे निशाँ रहता है

कौन कहता है ईश्क़ मज़ा देता है
इसमें जिस्मो जां दोनों जलता है

मुकेश न तो चाँद है न ही सूरज है
ईश्क़ का तारा है सुबह खिलता है

मुकेश इलाहाबादी --------------

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