चिंतन - क्या स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी हैं?

 चिंतन - क्या स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी हैं?

नदियाँ केवल पृथ्वी पर नहीं बहतीं। कुछ नदियाँ मनुष्य के भीतर भी बहती हैं। बाहर की नदियाँ समुद्र तक पहुँच जाती हैं, भीतर की नदियाँ कभी किसी किनारे तक नहीं पहुँचतीं। वे जीवन भर बहती रहती हैं—कभी दिखाई देती हुई, कभी भूमिगत होकर।

उनका नाम है—स्मृति।

मैं अक्सर सोचता हूँ कि समय को यदि किसी रूपक में बाँधना हो, तो वह घड़ी नहीं होगी, कैलेंडर भी नहीं। समय शायद एक नदी होगा। और यदि स्मृति को किसी रूपक में समझना हो, तो वह उस नदी का सबसे धीमा प्रवाह होगी।

धीमी इसलिए कि वह कभी सचमुच बीतती नहीं।

हम मान लेते हैं कि घटनाएँ पीछे छूट गईं। लोग चले गए। घर बदल गए। शहर बदल गए। ऋतुएँ बदल गईं। लेकिन स्मृति का जल किसी अदृश्य घाट पर ठहरा रहता है। वर्षों बाद भी कोई गंध, कोई धुन, कोई शब्द, कोई स्पर्श उस जल में हल्की-सी कंकड़ी फेंक देता है, और सतह पर फिर वही पुरानी लहरें उठने लगती हैं।

समय आगे बढ़ जाता है; स्मृति पीछे नहीं रहती। वह भीतर समानांतर बहती रहती है।

यही कारण है कि वृद्ध व्यक्ति अपने बचपन को वर्तमान काल में सुनाने लगता है। वह नहीं कहता—"वहाँ एक पेड़ था।" वह कहता है—"हमारे आँगन में एक नीम है।"

व्याकरण इसे भूल कह सकता है, पर चेतना जानती है कि स्मृति में कोई काल नहीं होता। वहाँ सब कुछ अभी घट रहा होता है।

शायद इसी कारण किसी प्रियजन की मृत्यु के वर्षों बाद भी हम अचानक उसकी आवाज़ सुन लेने का भ्रम पाल लेते हैं। कोई परिचित कदमों की आहट आती है, और मन एक क्षण के लिए विश्वास कर लेता है कि वह लौट आया है। यह भ्रम नहीं; स्मृति की नदी का एक पुराना मोड़ है, जहाँ समय अब भी रुका हुआ है।

स्मृतियाँ विचित्र हैं। वे इतिहास की तरह तथ्य नहीं बचातीं; वे अनुभूति बचाती हैं।

हमें बचपन की हर तारीख याद नहीं रहती, पर माँ की हथेली का ताप याद रहता है।

हमें परीक्षा में मिले अंक याद नहीं रहते, पर परिणाम वाले दिन की धड़कन याद रहती है।

हमें पहली यात्रा का पूरा रास्ता याद नहीं रहता, पर खिड़की से आती हवा का स्पर्श याद रहता है।

स्मृति घटनाओं की लेखाकार नहीं है; वह भावनाओं की संरक्षिका है।

इसलिए दो भाई एक ही घर में पलते हैं, पर उनकी स्मृतियों के घर अलग-अलग होते हैं। दोनों ने एक ही वर्षा देखी थी, पर एक को उसमें भीगना याद है, दूसरे को पिता की डाँट। घटना एक थी, नदी दो थीं।

यहाँ स्मृति हमें एक गहरा दार्शनिक संकेत देती है—मनुष्य वस्तुओं में नहीं, अर्थों में जीता है।

बाहर की दुनिया एक है, भीतर की दुनिया उतनी ही हैं जितने मनुष्य।

पर स्मृति केवल सहेजती ही नहीं, बदलती भी है।

समय उसके जल को पारदर्शी नहीं रहने देता। उसमें पश्चाताप घुल जाता है, करुणा उतर आती है, क्षमा का रंग मिल जाता है। जो व्यक्ति कभी हमें असह्य लगता था, वर्षों बाद उसकी स्मृति में एक कोमलता आ जाती है। जो दुख कभी असहनीय था, वही बाद में जीवन का सबसे मूल्यवान शिक्षक प्रतीत होता है।

स्मृति कभी-कभी सत्य से अधिक दयालु होती है।

शायद इसलिए साहित्य इतिहास से अधिक स्मरणीय होता है। इतिहास हमें बताता है कि क्या हुआ था; साहित्य हमें यह महसूस कराता है कि वह कैसा था।

एक और बात मुझे चकित करती है।

नदी कभी अपने जल को वापस नहीं बुलाती, फिर भी समुद्र तक पहुँच जाती है। स्मृति भी बीते हुए दिनों को वापस नहीं ला सकती, फिर भी मनुष्य को अधूरा नहीं रहने देती। वह हमें लौटाकर अतीत में नहीं ले जाती; वह अतीत को धीरे-धीरे हमारे वर्तमान में घोल देती है।

हम अपने बीते हुए वर्षों को ढोते नहीं; हम उनसे बने होते हैं।

यही कारण है कि स्मृति से भागना संभव नहीं। जिसे हम भूल जाना कहते हैं, वह प्रायः स्मृति को और गहरा दबा देना होता है। दबा हुआ जल सूखता नहीं; वह भूमिगत होकर किसी और जगह फूट पड़ता है।

कभी किसी कविता में।

कभी किसी स्वप्न में।

कभी किसी अनजान चेहरे में।

और कभी एक ऐसी ख़ामोशी में, जिसका कोई स्पष्ट कारण नहीं होता।

शायद मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी उपलब्धियों से कम और उसकी स्मृतियों से अधिक निर्मित होता है। हम जितना वर्तमान में दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक अपने भीतर के अतीत से बने होते हैं।

इसलिए स्मृतियों से युद्ध करना व्यर्थ है।

उन्हें पूजना भी आवश्यक नहीं।

उन्हें बस बहने देना चाहिए—वैसे ही जैसे नदी अपने प्रवाह में पत्थरों को भी साथ लेकर चलती है और फूलों को भी। वह किसी से प्रतिशोध नहीं लेती, किसी पर विशेष कृपा भी नहीं करती। वह केवल बहती रहती है।

शायद स्मृति का धर्म भी यही है—जीवन को बार-बार जीने नहीं, उसे धीरे-धीरे समझने देना।

और तब लगता है कि समय वास्तव में तेज़ नहीं है। तेज़ तो हमारी व्यस्तताएँ हैं। समय तो स्मृतियों की तरह बहुत धीरे चलता है। इतना धीरे कि एक बूढ़े मनुष्य की आँख में आज भी उसका बचपन चमक उठता है, और एक बूढ़ी माँ के लिए उसका पचास वर्ष का पुत्र भी अब तक वही नंगे पाँव दौड़ता हुआ बालक रहता है।

तभी समझ में आता है—स्मृतियाँ समय की सबसे धीमी नदी नहीं हैं; वे समय का वह जल हैं, जिसमें मनुष्य अपनी बदलती हुई आकृति को बार-बार पहचानता है।

मुकेश ,,,,,,,,,,

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