.चिंतन - क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है?
.चिंतन - क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है?
मनुष्य ने प्रेम की अनेक परिभाषाएँ लिखीं, पर शायद उसकी सबसे सच्ची परिभाषा कभी शब्दों में नहीं आई। वह आई—प्रतीक्षा में।
मैं अक्सर सोचता हूँ, प्रेम की पहचान मिलन से कम और प्रतीक्षा से अधिक क्यों होती है? जो सहज उपलब्ध है, वह मन को प्रिय हो सकता है; किंतु जो अनुपस्थित होकर भी भीतर उपस्थित रहे, वही शायद प्रेम है।
इसलिए प्रश्न उठता है—क्या प्रतीक्षा ही प्रेम का सबसे दीर्घ वाक्य है?
प्रतीक्षा समय को केवल काटती नहीं, उसे अर्थ भी देती है। जिस समय में किसी की प्रतीक्षा न हो, वह केवल घड़ी की सूइयों का चलना है। किंतु जिस क्षण किसी के आने की संभावना मन में हो, वही क्षण अचानक जीवित हो उठता है। तब एक-एक पल अपनी अलग ध्वनि रखने लगता है।
समय तब कैलेंडर नहीं रहता, धड़कन बन जाता है।
ध्यान से देखिए, प्रकृति का अधिकांश सौंदर्य भी प्रतीक्षा में ही जन्म लेता है।
बीज वर्षा की प्रतीक्षा करता है।
धरती बादलों की।
भोर सूर्य की।
चकोर चंद्रमा की।
और समुद्र उस नदी की, जो अंततः उसकी ओर लौटेगी।
प्रकृति जानती है कि जो बिना प्रतीक्षा के मिल जाए, उसका मूल्य प्रायः क्षणिक होता है।
मनुष्य ने प्रतीक्षा को अक्सर असहायता समझ लिया है। उसे लगता है कि प्रतीक्षा निष्क्रिय है। जबकि सत्य इसके विपरीत है। प्रतीक्षा भीतर का सबसे सक्रिय कर्म है। बाहर से कुछ नहीं बदलता, पर भीतर बहुत कुछ बदल जाता है। जो प्रतीक्षा करता है, वह हर दिन थोड़ा-थोड़ा नया मनुष्य बनता है।
प्रेम में प्रतीक्षा इसलिए कठिन नहीं होती कि सामने वाला नहीं आया; वह इसलिए कठिन होती है कि प्रतीक्षा करते-करते हम अपने ही भीतर के अनेक चेहरों से मिल लेते हैं।
अधैर्य से।
आशा से।
भय से।
विश्वास से।
और कभी-कभी अपने अहंकार से भी।
प्रतीक्षा प्रेम की नहीं, स्वयं की परीक्षा बन जाती है।
भारतीय काव्य-परंपरा में विरह को इतना ऊँचा स्थान यूँ ही नहीं मिला। विरह केवल दूरी का दुःख नहीं है; वह प्रेम की अग्नि है, जिसमें आसक्ति का धुआँ धीरे-धीरे जलकर समाप्त होता है। मिलन में हम दूसरे को देखते हैं; विरह में हम अपने प्रेम को देखते हैं।
यही कारण है कि अनेक संतों ने ईश्वर को पाने से अधिक उसकी प्रतीक्षा का रस गाया है। उन्हें ज्ञात था कि प्रतीक्षा में जो तड़प है, वही अंततः साधना बन जाती है। ईश्वर मिल जाए, तो कथा समाप्त हो सकती है; पर उसकी प्रतीक्षा मनुष्य को निरंतर परिष्कृत करती रहती है।
शायद इसीलिए भक्ति का सबसे बड़ा शब्द "दर्शन" नहीं, "अभिलाषा" है।
लेकिन हर प्रतीक्षा प्रेम नहीं होती।
रेलवे स्टेशन पर खड़ा यात्री भी प्रतीक्षा कर रहा है।
अस्पताल के बाहर बैठा परिजन भी।
नौकरी के परिणाम की प्रतीक्षा करता युवक भी।
इन सबमें एक समानता है—वे केवल किसी घटना की प्रतीक्षा नहीं कर रहे, वे अपने भविष्य के एक रूप की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
प्रतीक्षा हमेशा बाहर नहीं होती; उसका बड़ा भाग भीतर घटित होता है।
और तब समझ में आता है कि प्रेम की प्रतीक्षा इतनी गहरी क्यों होती है। क्योंकि वहाँ हम किसी व्यक्ति की नहीं, अपने उस स्वरूप की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं, जो उसके आने पर पूर्ण हो उठेगा।
फिर एक दिन अनुभव सिखाता है कि कोई भी मनुष्य हमें पूर्ण नहीं कर सकता।
पूर्णता प्रतीक्षा के समाप्त होने में नहीं, उसके रूपांतरित हो जाने में है।
जब प्रतीक्षा शिकायत छोड़कर प्रार्थना बन जाती है, तब प्रेम परिपक्व होता है।
जब वह अधिकार छोड़कर विश्वास बन जाती है, तब प्रेम मुक्त होता है।
और जब वह किसी एक व्यक्ति से आगे बढ़कर समूचे जीवन के प्रति खुल जाती है, तब प्रेम करुणा बन जाता है।
शायद इसलिए माँ जीवन भर अपने बच्चों की प्रतीक्षा करती है, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के। वह जानती है कि वे आएँगे भी, और नहीं भी आएँगे। फिर भी उसके आँगन का द्वार बंद नहीं होता। प्रेम की सबसे सुंदर पहचान यही है—वह प्रतीक्षा करता है, पर बंधन नहीं बनाता।
यह संसार भी एक प्रकार की प्रतीक्षा ही है।
बीज वृक्ष होने की प्रतीक्षा है।
बालक मनुष्य होने की।
मनुष्य अपने अर्थ की।
और आत्मा उस मौन की, जहाँ उसे फिर किसी प्रतीक्षा की आवश्यकता न रहे।
तब लगता है, प्रतीक्षा वास्तव में समय का व्यर्थ व्यय नहीं है। वह प्रेम का सबसे लंबा वाक्य है—ऐसा वाक्य, जिसमें विराम बहुत हैं, शब्द कम हैं, और अर्थ सबसे अधिक।
और शायद प्रेम की अंतिम परिपक्वता यही है कि प्रतीक्षा समाप्त नहीं होती; उसका स्वर बदल जाता है। तब हम किसी के आने की प्रतीक्षा नहीं करते, बल्कि अपने भीतर उस प्रकाश के उदय की प्रतीक्षा करते हैं, जहाँ प्रेम उपस्थिति का नहीं, अस्तित्व का स्वभाव बन जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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