शब्दयात्री — जो नहीं हुआ

 शब्दयात्री — जो नहीं हुआ

ज़िंदगी में कुछ दास्तानें ऐसी भी होती हैं जो कभी लिखी नहीं जातीं, लेकिन उम्र भर पढ़ी जाती रहती हैं।

वे किसी किताब के सफ़्हों पर नहीं मिलतीं, न किसी तस्वीर में क़ैद होती हैं। उनका वजूद बस दिल के किसी ख़ामोश कोने में होता है, जहाँ वक़्त की धूल भी पहुँचकर उन्हें मिटा नहीं पाती।

मेरे पास भी ऐसी ही एक दास्तान है।

एक दास्तान जो कभी हुई नहीं।

या यूँ कहूँ कि जो पूरी नहीं हुई।

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारी ज़िंदगी में कुछ लोग मिलने के लिए नहीं आते, सिर्फ़ याद बन जाने के लिए आते हैं।

वे आते हैं, कुछ लम्हों के लिए हमारी रूह में ठहरते हैं, और फिर किसी अनजाने मौसम की तरह गुज़र जाते हैं।

लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी आहट बरसों तक दिल के दरवाज़ों पर सुनाई देती रहती है।

अजीब बात है—

जो रिश्ते मुकम्मल हो जाते हैं, वे धीरे-धीरे ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।

मगर जो मुकम्मल नहीं हो पाते,

वे अफ़साना बन जाते हैं।

मुझे याद नहीं कि वह आख़िरी मुलाक़ात थी या पहली जुदाई।

बस इतना याद है कि उसकी आँखों में कुछ अनकहे अल्फ़ाज़ ठहरे हुए थे और मेरे होंठों पर कुछ अधूरे जुमले।

हम दोनों ने शायद बहुत कुछ कहना चाहा था।

मगर कुछ बातें तक़दीर से ज़्यादा ख़ामोशी की अमानत होती हैं।

वे कही नहीं जातीं।

सिर्फ़ महसूस की जाती हैं।

आज सोचता हूँ,

अगर उस दिन एक जुमला और कह दिया होता...

अगर एक क़दम और बढ़ा लिया होता...

अगर दिल की बात ज़ुबान तक आ गई होती...

तो क्या कहानी कुछ और होती?

शायद हाँ।

शायद नहीं।

मगर ज़िंदगी "शायद" के जवाब नहीं देती।

वह सिर्फ़ यादें देती है।

और यादें भी कैसी—

जिनमें न कोई शिकायत होती है,

न कोई दावा।

बस एक मीठी-सी कसक होती है,

जो हर बरस कुछ और गहरी हो जाती है।

अब कभी-कभी किसी शाम, जब धूप आख़िरी बार खिड़की पर ठहरती है, मैं उन लम्हों को याद करता हूँ जो कभी मेरे हुए ही नहीं।

उसकी हँसी,

जो मेरे घर की दीवारों ने कभी नहीं सुनी।

उसकी आवाज़,

जो मेरे दिनों की आदत कभी नहीं बनी।

उसका नाम,

जिसे मैंने कभी अपने नाम के साथ नहीं लिखा।

और फिर भी...

न जाने क्यों लगता है कि वह मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है।

शायद इसलिए कि मुहब्बत हमेशा हासिल करने का नाम नहीं होती।

कभी-कभी मुहब्बत सिर्फ़ दिल में एक चराग़ जलाए रखने का नाम होती है।

एक ऐसा चराग़,

जो किसी के आने की उम्मीद में नहीं,

किसी की याद की हिफ़ाज़त में जलता है।

उम्र के इस मोड़ पर आकर समझ में आता है कि हर मुहब्बत का अंजाम मिलन नहीं होता।

कुछ मुहब्बतें बस रूह की तामीर करती हैं।

वे हमें किसी और का नहीं,

अपना गहरा परिचय देती हैं।

वे सिखाती हैं कि दिल कितना वसीअ हो सकता है।

कि किसी की ग़ैर-मौजूदगी भी कभी-कभी एक मौजूदगी की तरह साथ रह सकती है।

और तब लगता है

ज़िंदगी की सबसे ख़ूबसूरत दास्तानों में से कुछ वही होती हैं,

जो कभी मुकम्मल नहीं होतीं।

क्योंकि जो मुकम्मल हो जाए,

वह हक़ीक़त बन जाती है।

और जो मुकम्मल न हो सके,

वह उम्र भर शायरी बना रहता है।

मुकेश ,

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