चिंतन - क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है?
चिंतन - क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है?
हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ गति को सफलता समझ लिया गया है। सब कुछ शीघ्र चाहिए—ज्ञान भी, धन भी, प्रेम भी, प्रतिष्ठा भी। प्रतीक्षा अब गुण नहीं, बाधा मानी जाने लगी है। अधैर्य हमारे समय का सबसे बड़ा संस्कार बनता जा रहा है।
तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है?
धैर्य का अर्थ रुक जाना नहीं है।
धैर्य का अर्थ है—चलते रहना, बिना घबराए।
नदी को समुद्र तक पहुँचने की जल्दी नहीं होती। वह हर मोड़ को स्वीकार करती है, हर पत्थर को छूती है, हर घाट को प्रणाम करती हुई आगे बढ़ती है। यदि वह अधीर हो जाए, तो बाढ़ बन जाएगी; यदि धैर्य रखे, तो जीवन बन जाएगी।
मनुष्य भी कुछ ऐसा ही है।
जब वह समय से लड़ता है, तो भीतर बाढ़ आ जाती है।
जब वह समय के साथ चलना सीखता है, तो जीवन में लय उतर आती है।
धैर्य की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि वह देर तक प्रतीक्षा कर सकता है। उसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि प्रतीक्षा के दौरान भी उसका विश्वास नहीं टूटता।
यही धैर्य को साधारण सहनशीलता से अलग करता है।
सहन करना कभी-कभी विवशता हो सकता है।
धैर्य एक जागरूक चुनाव है।
बीज को देखिए।
वह मिट्टी में दब जाने का विरोध नहीं करता। अंधकार से शिकायत नहीं करता। उसे पता है कि अभी उसका समय जड़ों का है, फूलों का नहीं।
यदि वह अधीर होकर समय से पहले बाहर आना चाहे, तो अंकुर भी नहीं बन पाएगा।
प्रकृति का प्रत्येक सृजन धैर्य का परिणाम है।
ऋतुएँ अपने समय पर आती हैं।
फूल अपने समय पर खिलते हैं।
फल अपने समय पर पकते हैं।
केवल मनुष्य ही समय को आदेश देना चाहता है।
और जब समय उसकी बात नहीं मानता, तो वह निराश हो जाता है।
मुझे लगता है कि धैर्य का सबसे सुंदर रूप किसान के पास होता है।
वह बीज बोने के अगले दिन खेत नहीं खोदता कि अंकुर निकला या नहीं। उसे विश्वास होता है कि धरती अपना कार्य कर रही है। उसका काम श्रम करना था, परिणाम को पकाना नहीं।
जीवन भी ऐसी ही खेती है।
हम कर्म कर सकते हैं।
पर फल को समय ही पकाता है।
अधैर्य का जन्म वहीं होता है, जहाँ विश्वास कम होने लगता है।
हमें लगता है कि यदि अभी कुछ नहीं हुआ, तो कभी नहीं होगा।
पर समय का अपना व्याकरण है।
वह कभी घड़ी की सुइयों से नहीं चलता।
वह परिपक्वता से चलता है।
एक विचार को भी समय चाहिए।
एक संबंध को भी।
एक कलाकार को भी।
एक साधक को भी।
यहाँ तक कि दुःख को भी।
हर पीड़ा उसी दिन नहीं समझी जाती, जिस दिन वह मिलती है। कई बार वर्षों बाद उसकी भूमिका स्पष्ट होती है। जो घटना कभी अभिशाप लगती थी, वही जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा सिद्ध होती है।
यह समझ धैर्य के बिना नहीं आती।
भारतीय दर्शन में धैर्य को केवल नैतिक गुण नहीं माना गया; उसे तप कहा गया। तप का अर्थ केवल कठिनाई सहना नहीं, बल्कि समय को अपना गुरु मान लेना है।
जो समय से लड़ता है, वह थक जाता है।
जो समय से सीखता है, वह परिपक्व हो जाता है।
धैर्य का एक और रूप है—अपने भीतर के परिवर्तन पर विश्वास।
हम चाहते हैं कि एक दिन में क्रोध समाप्त हो जाए।
एक सप्ताह में मन शांत हो जाए।
कुछ महीनों में जीवन बदल जाए।
पर चेतना किसी मशीन की तरह नहीं बदलती।
वह वृक्ष की तरह बढ़ती है।
धीरे-धीरे।
मौन में।
बिना घोषणा किए।
और एक दिन अचानक लगता है कि हम वही नहीं रहे, जो कभी थे।
यह परिवर्तन धैर्य का ही उपहार है।
शायद इसलिए गुरु अपने शिष्य को ज्ञान से पहले धैर्य सिखाते थे। क्योंकि अधीर मन ज्ञान को भी उपलब्धि बना लेता है, अनुभूति नहीं।
धैर्य हमें यह सिखाता है कि हर प्रश्न का उत्तर तुरंत मिलना आवश्यक नहीं।
कुछ उत्तर हमें तब मिलते हैं, जब हम उन्हें पूछना भी छोड़ चुके होते हैं।
कुछ द्वार तब खुलते हैं, जब हम उन्हें पीटना बंद कर देते हैं।
और कुछ प्रकाश तब दिखाई देता है, जब हम अंधकार से लड़ना छोड़कर उसमें देखने लगते हैं।
अंततः धैर्य समय की प्रतीक्षा नहीं है।
धैर्य समय पर विश्वास है।
यह विश्वास कि जो होना है, वह अपने उचित क्षण पर होगा; और जो नहीं होना है, उसे कोई अधैर्य संभव नहीं बना सकता।
तभी लगता है—
धैर्य समय के साथ की गई सबसे गहरी मैत्री है।
जो समय का मित्र बन जाता है, वह परिस्थितियों का दास नहीं रहता।
वह जान जाता है कि जीवन की सबसे सुंदर चीज़ें कभी जल्दी में नहीं जन्म लेतीं।
और शायद मनुष्य भी अपनी सबसे सुंदर अवस्था तक धीरे-धीरे ही पहुँचता है।
— मुकेश
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