तुम्हारी हँसी
तुम्हारी हँसी
तुम्हारी हँसी...
जाने उसमें ऐसा क्या है,
कि जब भी सुनता हूँ,
दिन की सारी थकान
बिना कुछ कहे उतर जाती है।
तुम हँसती हो,
तो लगता है जैसे किसी बंद कमरे की खिड़की
अचानक खुल गई हो,
और ताज़ा हवा अपने साथ
थोड़ी-सी धूप भी ले आई हो।
मैंने बहुत-सी आवाज़ें सुनी हैं—
बारिश की,
नदी की,
पत्तों की सरसराहट की,
मस्जिद की अज़ान की,
मंदिर की घंटियों की...
मगर तुम्हारी हँसी में
इन सबका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा बसा है।
वह शोर नहीं करती,
बस दिल में उतर जाती है।
तुम्हें शायद ख़बर भी नहीं होगी
कि जब तुम हँसती हो,
तो तुम्हारी आँखें
तुम्हारे होंठों से पहले मुस्कुराती हैं।
और मैं...
हर बार
उन्हीं आँखों में ठहर जाता हूँ।
अजीब बात है,
इंसान किसी के चेहरे से नहीं,
उसकी हँसी से मोहब्बत करने लगता है।
क्योंकि चेहरा वक़्त के साथ बदल जाता है,
लेकिन हँसी...
अगर दिल से निकले,
तो उम्र भर वैसी ही रहती है।
कभी-कभी सोचता हूँ,
अगर किसी दिन
तुम अपनी हँसी भूल जाओ,
तो मैं उसे अपनी यादों से निकालकर
फिर तुम्हें लौटा दूँगा।
क्योंकि कुछ चीज़ों पर
सिर्फ़ उनका हक़ नहीं होता,
जो उन्हें अपने साथ लेकर चलते हैं।
उन पर उनका भी हक़ होता है,
जो उन्हें अपनी रूह में सँभालकर रखते हैं।
इसलिए...
तुम यूँ ही हँसती रहना।
तुम्हें शायद मालूम न हो,
मगर तुम्हारी हँसी
किसी और की दुनिया में
रौशनी का सबब भी हो सकती है।
मुकेश ,,
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