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तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो...
तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो,
तो मुझे तुम्हारी आँखों से ज़्यादा तुम्हारी ख़ामोशी पर यक़ीन आता है।
वह ख़ामोशी, जो हर शिकायत से पहले मुस्कुरा देती है।
तुम्हारे होंठ रूठने की कोशिश करते हैं,
मगर तुम्हारी नज़रें हर बार तुम्हारा साथ छोड़ देती हैं।
वे चुपके से बता देती हैं
कि नाराज़गी सिर्फ़ एक बहाना है,
असल बात तो यह है कि तुम चाहती हो
मैं तुम्हें थोड़ा और मनाऊँ।
मैं जानता हूँ...
तुम्हारे "जाइए, मुझे आपसे बात नहीं करनी..." में भी
एक मासूम-सी इल्तिज़ा छिपी होती है—
"ज़रा-सा और ठहरो..."
तुम्हारा रूठना भी कितना अजीब है।
उसमें ग़ुस्से से ज़्यादा मुहब्बत होती है,
शिकायत से ज़्यादा अपनापन,
और अल्फ़ाज़ से ज़्यादा इंतज़ार।
मैं अक्सर सोचता हूँ,
अगर तुम सचमुच कभी नाराज़ हो गईं,
तो शायद इतनी ख़ामोश नहीं रहोगी।
क्योंकि जो लोग दिल से दूर हो जाते हैं,
वे शिकायत भी नहीं करते।
वे बस चले जाते हैं।
इसलिए तुम्हारा यूँ बेवजह रूठ जाना,
मेरे लिए इस बात का सबसे ख़ूबसूरत सबूत है
कि मेरे हिस्से की जगह
अब भी तुम्हारे दिल में कहीं महफ़ूज़ है।
इसलिए...
तुम झूठ-मूठ नाराज़ होती रहना,
और मैं हर बार
उतनी ही सच्चाई से तुम्हें मनाता रहूँगा।
क्योंकि कुछ रिश्ते
इज़हार से नहीं,
ऐसी ही छोटी-छोटी अदाओं से ज़िंदा रहते हैं।
मुकेश ,,
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