चिंतन - क्या प्रश्न भी चेतना के कठफोड़वे होते हैं?

 चिंतन - क्या प्रश्न भी चेतना के कठफोड़वे होते हैं?

कुछ प्रश्न उत्तर पाने के लिए नहीं जन्म लेते; वे भीतर सोई हुई किसी लकड़ी पर लगातार चोंच मारने के लिए आते हैं।

मैंने कई बार सोचा है कि प्रश्न आखिर होते क्या हैं? क्या वे केवल भाषा के व्याकरण हैं? केवल जिज्ञासा की आकृतियाँ? या वे हमारी चेतना के ऐसे कठफोड़वे हैं, जो मन के वृक्ष पर तब तक चोंच मारते रहते हैं, जब तक भीतर छिपा हुआ कोई जीवित रस बाहर न आ जाए?

वन में कठफोड़वा किसी वृक्ष को नष्ट करने नहीं आता। वह उसकी छाल पर प्रहार करता है क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उस कठोर सतह के नीचे जीवन की कोई हलचल है। यदि वृक्ष बिल्कुल मृत हो, तो वह वहाँ अधिक देर नहीं ठहरता। उसके प्रहार में हिंसा नहीं, खोज होती है।

प्रश्न भी शायद ऐसे ही होते हैं।

वे हमारी निश्चितताओं की छाल पर चोट करते हैं। वे विश्वासों के तनों पर अपनी नुकीली चोंच टिकाकर पूछते हैं—"क्या सचमुच यही सत्य है?" और जब तक भीतर से कोई उत्तर, कोई संशय, कोई नई संभावना बाहर नहीं आती, वे रुकते नहीं।

मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह नहीं कि उसके पास उत्तर नहीं हैं। उसका सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि उसके भीतर प्रश्न मर जाते हैं।

जिस दिन मन प्रश्न करना छोड़ देता है, उसी दिन वह अपने भीतर एक सूखा जंगल उगा लेता है। वहाँ विचारों की हरियाली नहीं रहती, केवल आदतों की लकड़ियाँ रह जाती हैं। तब जीवन चलता तो है, पर बढ़ता नहीं। साँसें आती-जाती हैं, पर चेतना ठहर जाती है।

इसीलिए शायद उपनिषदों ने उत्तरों से अधिक प्रश्नों का सम्मान किया। नचिकेता ने प्रश्न किया, इसलिए यमराज को मौन तोड़ना पड़ा। अर्जुन ने प्रश्न किया, इसलिए युद्धभूमि में गीता का जन्म हुआ। बुद्ध ने प्रश्न किया, इसलिए राजमहल से निकलकर बोधिवृक्ष तक पहुँच गए। प्रश्न केवल ज्ञान की सीढ़ी नहीं होते; वे नियति की दिशा भी बदल देते हैं।

पर हर प्रश्न कठफोड़वा नहीं होता।

कुछ प्रश्न केवल शोर होते हैं। वे बाहर की दुनिया में बहसें खड़ी करते हैं, भीतर कोई कंपन नहीं जगाते। चेतना का कठफोड़वा वही प्रश्न है, जो हमें स्वयं से असहज कर दे। जो हमारी सुविधा को तोड़ दे। जो हमारे अहंकार की छाल में पहला छेद बना दे।

ऐसे प्रश्न बड़े विनम्र होते हैं। वे घोषणा नहीं करते; वे दस्तक देते हैं।

कभी वे रात के तीसरे पहर पूछते हैं—"तुम जो बन गए हो, क्या वही बनना चाहते थे?"

कभी किसी श्मशान से लौटते हुए पूछते हैं—"जिसे इतना जोड़ रहे हो, वह किसके लिए है?"

कभी किसी बच्चे की आँखों से झाँककर पूछते हैं—"आख़िरी बार बिना किसी कारण कब हँसे थे?"

और कभी किसी प्रेम-विछोह के बाद पूछते हैं—"क्या प्रेम किसी व्यक्ति से था, या अपने ही बनाए हुए स्वप्न से?"

ये प्रश्न उत्तरों से अधिक हमारी चुप्पियों को सुनते हैं।

अद्भुत बात यह है कि कठफोड़वा जितनी बार चोंच मारता है, वृक्ष उतना ही भीतर तक खुलता जाता है। प्रश्न भी जितनी बार लौटता है, मन उतनी ही गहराई में उतरता जाता है। पहली बार हम उत्तर देते हैं; दूसरी बार तर्क देते हैं; तीसरी बार मौन हो जाते हैं। और अक्सर वही मौन सबसे सच्चा उत्तर होता है।

भारतीय दर्शन में नेति-नेति का विधान भी तो एक प्रकार का कठफोड़वा ही है। वह हर उत्तर पर चोंच मारता है—"यह भी नहीं, वह भी नहीं।" जब तक सारी छालें टूट न जाएँ, जब तक आत्मा का नितांत निर्वस्त्र सत्य सामने न आ जाए, तब तक प्रश्न अपनी यात्रा समाप्त नहीं करता।

इसलिए प्रश्नों से डरना नहीं चाहिए।

जो मनुष्य अपने प्रश्नों को दबा देता है, वह धीरे-धीरे अपने भीतर दीमकों को पाल लेता है। बाहर से उसका व्यक्तित्व बहुत मजबूत दिखाई देता है, पर भीतर खोखला हो चुका होता है। प्रश्नों की चोट कभी-कभी पीड़ादायक होती है, पर वह खोखलापन बचा लेती है। कठफोड़वे की चोंच वृक्ष को घायल कम, जीवित अधिक रखती है।

जीवन में जो लोग सबसे अधिक जागे हुए दिखाई देते हैं, उनके पास सबसे अधिक उत्तर नहीं होते; उनके पास सबसे अधिक सच्चे प्रश्न होते हैं। वे जानते हैं कि अंतिम सत्य तक पहुँचने का मार्ग किसी निष्कर्ष से नहीं, एक ईमानदार प्रश्न से शुरू होता है।

शायद इसी कारण ब्रह्मांड आज भी विस्तार कर रहा है। यदि सृष्टि के पास सारे उत्तर पहले ही दिन होते, तो न नए तारे जन्म लेते, न नई आकाशगंगाएँ, न नया विचार, न नई कविता। सृष्टि स्वयं एक अनंत प्रश्न है, और हम सब उसके भीतर लिखे हुए छोटे-छोटे प्रश्नचिह्न।

इसलिए अब जब भी कोई प्रश्न मेरे भीतर बार-बार लौटता है, मैं उसे चुप कराने की जल्दी नहीं करता। मैं समझ जाता हूँ कि मेरी चेतना का कोई कठफोड़वा किसी पुराने वृक्ष पर अपनी चोंच आज़मा रहा है। हो सकता है, उसी प्रहार से भीतर छिपा कोई स्रोत फूट पड़े; कोई नया अर्थ जन्म ले; या शायद मैं पहली बार अपने ही भीतर के वन की आवाज़ सुन सकूँ।

क्योंकि अंततः प्रश्न उत्तरों के शत्रु नहीं होते—वे चेतना के माली होते हैं। वे सूखी लकड़ी नहीं, जीवित वृक्ष खोजते हैं। जहाँ वे लगातार दस्तक देते हैं, वहाँ मनुष्य धीरे-धीरे ज्ञानी नहीं, जाग्रत होने लगता है। और शायद जागरण ही मनुष्य का सबसे बड़ा उत्तर है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है