चिंतन - क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है?
चिंतन - क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है?
मनुष्य का इतिहास यदि ध्यान से पढ़ा जाए, तो वह उत्तरों का इतिहास कम और प्रश्नों का इतिहास अधिक प्रतीत होता है। प्रत्येक युग ने अपने उत्तर गढ़े, और प्रत्येक अगला युग उन्हीं उत्तरों पर नए प्रश्न लेकर खड़ा हो गया। मानो सत्य कोई स्थिर शिला नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षितिज है जो हर कदम पर थोड़ा और दूर चला जाता है।
तब मन में एक विचार उठता है—क्या मनुष्य अपने उत्तरों से नहीं, अपने प्रश्नों से बड़ा होता है?
उत्तर प्रायः समय के होते हैं, प्रश्न चेतना के।
उत्तर परिस्थितियों के साथ बदल जाते हैं; प्रश्न युगों को पार कर जाते हैं। आज भी वही प्रश्न हमारे भीतर जीवित हैं जो हजारों वर्ष पहले किसी ऋषि, किसी दार्शनिक, किसी कवि या किसी साधारण मनुष्य के भीतर उठे होंगे—
मैं कौन हूँ?
सत्य क्या है?
प्रेम क्यों है?
दुःख का अर्थ क्या है?
और सबसे बड़ा प्रश्न—मैं यहाँ क्यों हूँ?
इन प्रश्नों का कोई अंतिम उत्तर आज तक नहीं मिला। फिर भी मनुष्य उन्हें छोड़ता नहीं। शायद इसलिए कि कुछ प्रश्न हल करने के लिए नहीं, मनुष्य को विकसित करने के लिए जन्म लेते हैं।
एक विद्यार्थी परीक्षा में उत्तर लिखकर उत्तीर्ण हो सकता है, पर जीवन की परीक्षा में केवल उत्तर पर्याप्त नहीं होते। वहाँ यह भी देखा जाता है कि उसने कौन-से प्रश्न पूछे।
जो व्यक्ति कभी अपने जीवन पर प्रश्न नहीं करता, वह धीरे-धीरे अपने ही बनाए हुए ढाँचे में कैद हो जाता है। उसकी मान्यताएँ उसकी जेल बन जाती हैं। उसे लगता है कि उसने सत्य पा लिया है, जबकि उसने केवल अपनी सुविधा को सत्य मान लिया होता है।
इसके विपरीत, जो मनुष्य प्रश्न पूछता रहता है, वह जीवित रहता है। उसके भीतर परिवर्तन की संभावना बची रहती है।
वृक्ष तभी तक बढ़ता है, जब तक उसकी जड़ें धरती से प्रश्न करती रहती हैं। जैसे ही जड़ें पानी खोजना छोड़ दें, वृक्ष का विकास रुक जाता है।
चेतना भी ऐसी ही है।
वह उत्तरों से तृप्त नहीं होती; वह नए क्षितिज खोजती है।
शायद इसलिए महान वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी विशेषता उनके उत्तर नहीं थे। उनका साहस था—सबसे स्वीकृत सत्य पर भी प्रश्न करने का। और संतों की सबसे बड़ी पहचान उनके उपदेश नहीं थे; उनकी बेचैनी थी—परम सत्य को प्रत्यक्ष जानने की।
प्रश्न ही मनुष्य को परंपरा का अनुयायी होने से बचाते हैं।
लेकिन प्रश्न पूछना सरल नहीं है।
प्रश्न का अर्थ है—अपने भीतर की सुविधा को अस्थिर करना।
प्रश्न का अर्थ है—यह स्वीकार करना कि "मैं अभी पूर्ण नहीं जानता।"
अहंकार को यह स्वीकार सबसे कठिन लगता है।
इसलिए अहंकारी मनुष्य जल्दी-जल्दी उत्तर देता है। विनम्र मनुष्य देर तक प्रश्न करता है।
ज्ञान का पहला चिह्न यह नहीं कि व्यक्ति बहुत बोलने लगे; बल्कि यह कि वह अधिक ध्यान से सुनने लगे। क्योंकि सुनना ही प्रश्न का दूसरा नाम है।
हमारे समय की एक विडंबना यह भी है कि सूचना बढ़ रही है, पर प्रश्न घट रहे हैं। लोग उत्तर खोजने से पहले खोज इंजन खोल लेते हैं। पर जो उत्तर बाहर मिल जाता है, वह हमेशा भीतर का समाधान नहीं बनता।
जीवन के सबसे गहरे प्रश्न इंटरनेट पर नहीं मिलते।
वे अकेलेपन में मिलते हैं।
वे किसी प्रियजन की विदाई के बाद मिलते हैं।
वे असफलता के बाद मिलते हैं।
वे उस रात मिलते हैं, जब सारी दुनिया सो रही होती है और मन स्वयं से पहली बार ईमानदारी से बात करता है।
वहीं से वास्तविक मनुष्य जन्म लेता है।
भारतीय दर्शन ने कभी अंतिम उत्तर देने का दावा नहीं किया। उसने यात्रा का आमंत्रण दिया। नेति-नेति कहकर उसने हर निष्कर्ष को फिर से खोल दिया। मानो कह रहा हो—"जहाँ तुम रुक गए हो, सत्य शायद उससे भी आगे है।"
यह दृष्टि अद्भुत है।
यह हमें कट्टर नहीं बनने देती।
यह हमें जिज्ञासु बनाए रखती है।
और जिज्ञासा ही चेतना का सबसे विश्वसनीय स्पंदन है।
जब मनुष्य प्रश्न करना छोड़ देता है, तभी वह भीतर से बूढ़ा होने लगता है। आयु से नहीं, जिज्ञासा के समाप्त हो जाने से वृद्धावस्था आती है। बच्चे इसलिए युवा हैं कि वे हर वस्तु से पूछते हैं—"यह क्या है?" और ऋषि इसलिए युवा हैं कि वे हर अनुभव से पूछते हैं—"क्या इसके पार भी कुछ है?"
दोनों के बीच का अंतर केवल भाषा का है; जिज्ञासा का नहीं।
अंततः शायद मनुष्य की ऊँचाई उसके उत्तरों से नहीं मापी जाएगी। उत्तर तो पुस्तकें भी दे सकती हैं, यंत्र भी दे सकते हैं। पर ऐसा प्रश्न, जो पूरी सभ्यता की दिशा बदल दे, केवल जाग्रत चेतना ही पूछ सकती है।
इसलिए अब मुझे लगता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका ज्ञान नहीं, उसकी जिज्ञासा है। उसके पास कितने उत्तर हैं, इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उसके भीतर अभी कितने प्रश्न जीवित हैं।
क्योंकि जिस दिन अंतिम प्रश्न मर जाता है, उसी दिन विकास भी समाप्त हो जाता है।
और जिस दिन एक नया प्रश्न जन्म लेता है, उसी दिन मनुष्य फिर से जन्म लेता है।
— मुकेश
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