तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो... (दूसरा पड़ाव)
तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो... (दूसरा पड़ाव)
तुम जब झूठ-मूठ नाराज़ होती हो,
तो तुम्हारी आँखों में एक अजीब-सी शरारत उतर आती है।
होंठ शिकायत करते हैं,
मगर निगाहें मेरी तरफ़ ही ठहरी रहती हैं।
जैसे उन्हें पूरा यक़ीन हो
कि मैं तुम्हें मनाने ज़रूर आऊँगा।
तुम्हारी नाराज़गी में भी
एक नाज़ है...
एक अदा है...
और एक ख़ामोश-सी दावत,
कि मैं तुम्हारे क़रीब आकर
तुम्हारी ख़ामोशी का मतलब पढ़ूँ।
तुम जानती हो,
तुम्हारा "बात मत कीजिए मुझसे"
दुनिया का सबसे झूठा जुमला है।
क्योंकि उसके अगले ही पल
तुम चुपके से देखती हो
कि मैंने सचमुच बात करना छोड़ तो नहीं दिया।
और मैं...
मैं भी कहाँ इतना समझदार हूँ।
हर बार तुम्हारी उसी बनावटी नाराज़गी में
अपनी मुहब्बत का नया बहाना ढूँढ़ लेता हूँ।
कभी तुम्हारा हाथ थामकर,
कभी तुम्हारी ज़ुल्फ़ों को कानों के पीछे सरकाकर,
कभी सिर्फ़ तुम्हारा नाम लेकर।
अजीब है न...
मुहब्बत में सबसे मीठे लम्हे
इज़हार के नहीं,
मनुहार के होते हैं।
जहाँ कोई सचमुच रूठा नहीं होता,
मगर दोनों चाहते हैं
कि मनाने का सिलसिला थोड़ा और लंबा हो जाए।
इसलिए...
तुम्हारा यूँ झूठ-मूठ नाराज़ होना,
मेरे लिए किसी ईद की चाँद-रात जैसा है।
जिसका इंतज़ार भी ख़ूबसूरत होता है,
और जिसका आना भी।
क्योंकि मुझे मालूम है,
तुम्हारे रूठे हुए लबों के पीछे
एक मुस्कान हमेशा मेरा इंतज़ार करती रहती है।
और मैं...
उसे देखने के लिए
हर बार
तुम्हारी नाराज़गी क़ुबूल कर लेता हूँ।
मुकेश ,,
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