चिंतन - क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है?

 चिंतन -  क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है?

मनुष्य ने पर्वत जीते, समुद्र पार किए, आकाश में उड़ना सीख लिया। उसने प्रकृति की अनेक शक्तियों को अपने ज्ञान से बाँध लिया। पर एक युद्ध ऐसा है, जिसमें सबसे अधिक पराजय मनुष्य को स्वयं से ही मिलती है।

वह युद्ध है—क्षमा का।

तभी मेरे भीतर यह प्रश्न उठता है—क्या क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है?

क्षमा को हम प्रायः दुर्बलता समझ लेते हैं। हमें लगता है कि जिसने प्रतिकार नहीं किया, वह हार गया। जिसने बदला नहीं लिया, वह कमज़ोर पड़ गया।

किन्तु जीवन बार-बार सिखाता है कि प्रतिशोध के लिए जितनी शक्ति चाहिए, उससे कहीं अधिक शक्ति क्षमा के लिए चाहिए।

क्रोध सहज है।

प्रतिशोध स्वाभाविक है।

पर क्षमा—साधना है।

क्रोध बाहर की घटना से जन्म लेता है; क्षमा भीतर की परिपक्वता से।

यही कारण है कि क्षमा किसी दूसरे पर किया गया उपकार नहीं, स्वयं पर किया गया अनुग्रह है।

जिसे हम क्षमा नहीं करते, वह व्यक्ति हमारे भीतर जीवित रहता है। वह हमारी स्मृतियों में बार-बार लौटता है। उसके कारण हमारा मन अशांत होता है। हम समझते हैं कि हम उसे दंड दे रहे हैं, जबकि वास्तव में हम स्वयं को उसके अतीत का बंदी बनाए रखते हैं।

क्षमा उस कारागार का द्वार खोल देती है।

मुझे लगता है कि क्षमा का अर्थ भूल जाना नहीं है।

स्मृति मिटाई नहीं जा सकती।

घटना बदली नहीं जा सकती।

विश्वास भी हर बार लौट आए, यह आवश्यक नहीं।

क्षमा का अर्थ केवल इतना है कि मैं अपने भीतर उस घटना को अपना भविष्य निर्धारित करने का अधिकार नहीं दूँगा।

यही क्षमा का साहस है।

वृक्ष को देखिए।

जिस हाथ ने कभी उसकी शाखा काटी थी, उसी हाथ को वह अगली ऋतु में फिर छाया देता है। नदी यह नहीं पूछती कि किसने उसके जल को मैला किया था; वह फिर भी बहती रहती है। सूर्य यह हिसाब नहीं रखता कि किसने उसकी ओर पीठ कर ली थी; वह फिर भी प्रकाश देता है।

प्रकृति में प्रतिशोध नहीं है।

केवल मनुष्य ने स्मृति को शस्त्र बना लिया है।

हम वर्षों तक अपने भीतर शिकायतों का संग्रह करते रहते हैं। एक-एक अपमान, एक-एक कटु वाक्य, एक-एक अस्वीकार—सबको सहेजकर रखते हैं। धीरे-धीरे हमारा हृदय संग्रहालय नहीं, गोदाम बन जाता है।

और जहाँ शिकायतें जमा होने लगती हैं, वहाँ आनंद के लिए स्थान कम पड़ जाता है।

क्षमा उस अनावश्यक बोझ को उतार देने की कला है।

लेकिन क्षमा का सबसे कठिन रूप दूसरों को क्षमा करना नहीं है।

स्वयं को क्षमा करना है।

कितने लोग जीवन भर किसी पुरानी भूल का दंड स्वयं को देते रहते हैं।

"मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।"

"यदि उस दिन मैंने ऐसा कहा होता..."

"यदि मैं थोड़ा और साहसी होता..."

इन अधूरे वाक्यों में पूरा जीवन बीत जाता है।

अतीत बदला नहीं जा सकता।

पर उसके साथ हमारा संबंध अवश्य बदल सकता है।

स्वयं को क्षमा करना अपनी भूलों को उचित ठहराना नहीं है।

यह स्वीकार करना है कि मैं अपनी भूल से बड़ा हूँ।

यदि बीज अपनी पहली असफल अंकुरण-चेष्टा को ही अंतिम सत्य मान लेता, तो कभी वृक्ष नहीं बन पाता।

जीवन भी हमें यही अवसर देता है—गिरकर भी आगे बढ़ने का।

भारतीय दर्शन में क्षमा को केवल नैतिक गुण नहीं, आध्यात्मिक शक्ति माना गया है। क्योंकि जहाँ क्षमा है, वहाँ अहंकार अधिक देर तक टिक नहीं सकता। अहंकार कहता है—"मुझे चोट पहुँची है।"

आत्मा कहती है—"मैं चोट से भी बड़ा हूँ।"

यहीं से क्षमा जन्म लेती है।

मुझे लगता है कि क्षमा न्याय का विरोध नहीं है।

अन्याय का प्रतिरोध आवश्यक है।

सत्य के पक्ष में खड़ा होना भी आवश्यक है।

किन्तु प्रतिरोध और प्रतिशोध में उतना ही अंतर है, जितना अग्नि और प्रकाश में।

एक जलाती है।

दूसरा दिशा देता है।

क्षमा अन्याय को स्वीकार करना नहीं है; वह द्वेष को अपने भीतर स्थायी निवास न देने का निर्णय है।

अंततः मनुष्य की सबसे बड़ी विजय दूसरों पर नहीं होती।

वह अपने ही क्रोध, अपने ही अहंकार और अपने ही दुःख पर होती है।

जिस दिन हम किसी के प्रति कटु स्मृति को भी करुणा में बदल सकें, उसी दिन भीतर एक नया आकाश खुलता है।

तब समझ में आता है—

क्षमा किसी अपराधी को मुक्त करने का नाम नहीं है; क्षमा स्वयं को बंदीगृह से मुक्त करने का नाम है।

और शायद इसी कारण—

क्षमा आत्मा की सबसे कठिन विजय है।

क्योंकि इसमें कोई दूसरा नहीं हारता।

केवल हमारा अहंकार हारता है।

और उसी पराजय में आत्मा की सबसे सुंदर जीत छिपी होती है।

— मुकेश

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