चिंतन - क्या संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी होता है?
चिंतन - क्या संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी होता है?
हमने बचपन से सीखा कि संदेह बुरा है। संदेह विश्वास को तोड़ देता है, संबंधों को कमज़ोर कर देता है, मन को अशांत कर देता है। इसलिए हमें विश्वास करना सिखाया गया, प्रश्न करना नहीं; स्वीकार करना सिखाया गया, परखना नहीं।
परंतु कभी-कभी मैं सोचता हूँ—यदि संसार के हर सत्य को बिना संदेह के स्वीकार कर लिया जाता, तो क्या मनुष्य कभी सत्य तक पहुँच पाता?
शायद नहीं।
क्योंकि हर महान खोज की शुरुआत विश्वास से नहीं, संदेह से हुई है।
संदेह का स्वभाव विचित्र है। वह नकार नहीं है; वह सत्य के प्रति ईमानदारी है। वह कहता है—"मैं मानने को तैयार हूँ, पर पहले जानना चाहता हूँ।" यही आग्रह मनुष्य को भीड़ से अलग करता है। भीड़ विश्वास करती है; साधक सत्यापित करता है।
इसलिए संदेह को केवल संशय कहना उसके साथ अन्याय होगा। वह चेतना का जागरण भी है।
एक शिशु जब पहली बार किसी वस्तु को हाथ में लेकर उसे उलट-पलट कर देखता है, तब वह केवल खेल नहीं रहा होता; वह संसार पर संदेह कर रहा होता है। वह यह स्वीकार नहीं करता कि जो दिखाई दे रहा है, वही उसका संपूर्ण स्वरूप है। उसकी जिज्ञासा ही उसका पहला दर्शन है।
यही जिज्ञासा आगे चलकर विज्ञान बनती है।
यही जिज्ञासा दर्शन बनती है।
और यही जिज्ञासा अध्यात्म भी बन जाती है।
अक्सर लोग विज्ञान और अध्यात्म को दो विरोधी दिशाएँ मान लेते हैं। किंतु दोनों का पहला कदम एक ही है—संदेह।
वैज्ञानिक पूछता है—"क्या यह नियम सचमुच ऐसा ही है?"
ऋषि पूछता है—"क्या मैं केवल यह शरीर हूँ?"
प्रश्न अलग हैं, पर साहस एक ही है।
भारतीय परंपरा का सौंदर्य भी यही है कि उसने संदेह को पाप नहीं माना। उपनिषद संवादों से भरे पड़े हैं। वहाँ शिष्य प्रश्न करता है, गुरु उत्तर देता है; फिर शिष्य उस उत्तर पर भी पुनः प्रश्न करता है। सत्य किसी आदेश से नहीं, संवाद से जन्म लेता है।
नेति-नेति का उद्घोष भी तो संदेह का ही परिष्कृत रूप है। यह नहीं, वह नहीं—तो फिर क्या है?
यह संदेह विनाश नहीं करता; वह परत-दर-परत असत्य को हटाता है।
किन्तु संदेह के भी दो रूप हैं।
एक संदेह वह है जो अहंकार से जन्म लेता है। उसे किसी उत्तर में रुचि नहीं होती। वह केवल हर बात का विरोध करना चाहता है। ऐसा संदेह अंततः मनुष्य को अकेला और कटु बना देता है। वह पुल नहीं बनाता, केवल दीवारें खड़ी करता है।
दूसरा संदेह विनम्र होता है। वह जानता है कि मैं नहीं जानता। उसी स्वीकार से ज्ञान का द्वार खुलता है। जो स्वयं को सर्वज्ञ मान बैठा, उसका विकास वहीं समाप्त हो गया। जो अपनी अज्ञानता को पहचान गया, उसकी यात्रा वहीं से आरंभ हुई।
सुकरात ने कहा था कि वह इसलिए बुद्धिमान है क्योंकि वह जानता है कि वह नहीं जानता। भारतीय ऋषियों ने भी अंततः यही कहा—"यस्यामतं तस्य मतम्।" जिसे लगता है कि उसने ब्रह्म को जान लिया, उसने नहीं जाना; और जिसे लगता है कि अभी जानना शेष है, उसकी यात्रा जीवित है।
ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान नहीं, ज्ञान का अहंकार है।
संदेह उसी अहंकार पर पहला प्रहार करता है।
जीवन में भी देखिए।
जो व्यक्ति कभी अपने क्रोध पर संदेह नहीं करता, वह उसे स्वभाव मान बैठता है।
जो अपने विचारों पर संदेह नहीं करता, वह उन्हें अंतिम सत्य समझ लेता है।
जो अपनी सफलता पर संदेह नहीं करता, वह विनम्रता खो देता है।
और जो अपने दुःख पर भी संदेह नहीं करता, वह उसे अपनी पहचान बना लेता है।
संदेह हमें अपने ही बनाए हुए कारागारों से बाहर आने का अवसर देता है।
लेकिन एक सीमा के बाद संदेह को भी छोड़ना पड़ता है।
यदि नाव को किनारे तक पहुँचाना है, तो नदी पार करने के बाद उसे सिर पर उठाकर नहीं चल सकते। संदेह साधन है, साध्य नहीं। वह द्वार तक लाता है; भीतर प्रवेश विश्वास ही कराता है।
बीज जब तक मिट्टी पर संदेह करता रहेगा, अंकुरित नहीं होगा। उसे एक क्षण ऐसा भी चुनना होगा, जब वह स्वयं को पूरी तरह मिट्टी के हवाले कर दे।
इसी प्रकार साधना में भी एक क्षण आता है, जब प्रश्न मौन हो जाते हैं। इसलिए नहीं कि सारे उत्तर मिल गए, बल्कि इसलिए कि प्रश्न पूछने वाला ही बदल गया।
संदेह ने अपना कार्य पूरा कर लिया होता है।
तब समझ में आता है कि आत्मा की यात्रा अंधविश्वास से नहीं, ईमानदार संदेह से शुरू होती है; लेकिन उसका अंतिम पड़ाव संदेह नहीं, अनुभूति है।
अनुभव वह स्थान है जहाँ प्रमाण की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। जैसे सूर्य निकल आए तो दीपक की ज़रूरत नहीं रहती।
शायद इसी कारण संदेह को शत्रु नहीं, सहयात्री समझना चाहिए। वह हमें भटकाने नहीं, जगाने आता है। वह हमारी श्रद्धा को तोड़ने नहीं, उसे परिपक्व बनाने आता है। क्योंकि जो श्रद्धा संदेह की अग्नि से नहीं गुज़री, वह प्रायः परंपरा होती है; और जो श्रद्धा संदेह को पार करके जन्म लेती है, वही अनुभूति बनती है।
इसलिए अब मुझे लगता है कि संदेह आत्मा की पहली सीढ़ी अवश्य है, पर अंतिम मंज़िल नहीं। वह हमें द्वार तक ले जाता है; भीतर प्रवेश तब होता है, जब संदेह स्वयं श्रद्धा में रूपांतरित हो जाता है। तभी मनुष्य मानता नहीं—जानता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
Comments
Post a Comment