चिंतन - क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है?
चिंतन - क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है?
मनुष्य ने घर बनाए—ईंटों के, पत्थरों के, लकड़ियों के। फिर उसने परिवार बनाए, समाज बनाए, राष्ट्र बनाए। पर इन सबके बीच वह एक ऐसे घर की तलाश करता रहा, जहाँ प्रवेश के लिए न कोई परिचय-पत्र चाहिए, न कोई रक्त-संबंध, न कोई अधिकार।
शायद उस घर का नाम मैत्री है।
तभी मेरे भीतर यह प्रश्न उठता है—क्या मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है?
मैत्री का अर्थ केवल मित्र होना नहीं है। मित्रता दो व्यक्तियों के बीच हो सकती है, पर मैत्री चेतना की अवस्था है। वह किसी एक मनुष्य तक सीमित नहीं रहती। उसका स्वभाव फैलना है।
जिस प्रकार दीपक यह नहीं चुनता कि किस दिशा में प्रकाश देना है, उसी प्रकार मैत्री यह नहीं चुनती कि किसे अपनापन देना है।
वह विभाजन नहीं करती।
वह उपस्थिति बन जाती है।
हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लोग परिचित बहुत हैं, पर मित्र बहुत कम। और उससे भी बड़ी विडंबना यह है कि मित्र तो मिल जाते हैं, पर मैत्री दुर्लभ होती जा रही है।
क्योंकि मित्रता कभी-कभी स्वार्थ से भी बन जाती है।
मैत्री कभी नहीं।
मित्रता परिस्थितियों से जन्म ले सकती है।
मैत्री केवल हृदय से जन्म लेती है।
जब तक सामने वाला हमारे विचारों से सहमत है, हमारे पक्ष में खड़ा है, हमारी अपेक्षाएँ पूरी कर रहा है—तब तक साथ निभाना कठिन नहीं। पर मैत्री की परीक्षा वहीं होती है, जहाँ मतभेद होते हैं, दूरी आती है, मौन फैलता है।
यदि अपनापन तब भी बचा रहे, तो समझिए मैत्री जीवित है।
मुझे लगता है कि मैत्री का पहला गुण है—दूसरे को बदलने की अधीरता का अभाव।
हम जिनसे प्रेम करते हैं, उन्हें भी अपने अनुसार ढालने लगते हैं। पर जिनसे मैत्री होती है, उन्हें उनके होने के अधिकार सहित स्वीकार करते हैं।
स्वीकार ही मैत्री का पहला द्वार है।
नदी पर्वत से यह नहीं कहती कि तुम समतल हो जाओ।
आकाश पक्षियों से यह नहीं कहता कि एक ही दिशा में उड़ो।
वन में कोई वृक्ष दूसरे वृक्ष की आकृति नहीं माँगता।
प्रकृति का प्रत्येक तत्व अपने भिन्न होने में भी एक-दूसरे का सहचर है।
यही मैत्री है।
भारतीय और बौद्ध परंपरा में मैत्री केवल सामाजिक व्यवहार नहीं, साधना मानी गई है। मैत्री-भावना का अभ्यास इसलिए कराया जाता था कि मनुष्य धीरे-धीरे अपने भीतर से शत्रुता का विष निकाल सके।
क्योंकि शत्रु बाहर कम होते हैं, भीतर अधिक।
अहंकार।
ईर्ष्या।
द्वेष।
प्रतिस्पर्धा।
यही वे दीवारें हैं, जो मैत्री के घर को छोटा कर देती हैं।
मैत्री का अर्थ यह नहीं कि सब लोग हमारे मित्र बन जाएँ। इसका अर्थ यह है कि हमारे भीतर किसी के प्रति अनावश्यक वैर न रह जाए।
यह अंतर बहुत सूक्ष्म है।
मैत्री किसी संबंध का नाम नहीं; किसी दृष्टि का नाम है।
ऐसी दृष्टि, जिसमें दूसरा मनुष्य प्रतिद्वंद्वी नहीं, सहयात्री दिखाई देता है।
जीवन की यात्राएँ अकेले पूरी नहीं होतीं।
कभी कोई हमारा हाथ पकड़ लेता है।
कभी कोई केवल इतना कह देता है—"मैं हूँ।"
और यही दो शब्द मनुष्य को टूटने से बचा लेते हैं।
मैत्री का सबसे सुंदर वाक्य शायद यही है—"मैं तुम्हें बदलने नहीं आया हूँ; मैं तुम्हारे साथ चलने आया हूँ।"
ऐसा साथ बहुत दुर्लभ होता है।
जो बिना निर्णय दिए सुन सके।
जो बिना अपेक्षा के साथ खड़ा रह सके।
जो बिना अधिकार जताए अपनापन दे सके।
वही मैत्री का पात्र है।
और शायद वही आत्मा का भी निकटतम संबंधी है।
धीरे-धीरे समझ में आता है कि मैत्री केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं रहती।
एक दिन पेड़ भी अपने लगने लगते हैं।
पक्षियों का स्वर भी परिचित हो जाता है।
नदी से भी संवाद होने लगता है।
आकाश भी अपना-सा प्रतीत होता है।
जब चेतना में मैत्री जागती है, तब संसार वस्तुओं का संग्रह नहीं रहता; वह संबंधों का विस्तार बन जाता है।
यही कारण है कि मैत्री का हृदय कभी अकेला नहीं होता।
वह जहाँ भी जाता है, अपने साथ एक घर ले जाता है।
क्योंकि उसका घर दीवारों से नहीं, आत्मीयता से बना होता है।
और तब लगता है—
मैत्री आत्मा का सबसे विस्तृत घर है।
उस घर में कोई अतिथि नहीं होता।
जो भी आता है, अपना हो जाता है।
— मुकेश
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