तुम्हें ख़बर भी नहीं
तुम्हें ख़बर भी नहीं
तुम्हें ख़बर भी नहीं,
कि तुम्हारा नाम
मैं कितनी बार लेता हूँ
बिना पुकारे।
कभी चाय की पहली चुस्की में,
कभी किसी किताब के आख़िरी सफ़्हे पर,
कभी शाम की ढलती हुई धूप में,
और कभी...
बिल्कुल बेवजह।
अजीब है न,
कुछ लोग
याद नहीं आते,
वे बस
हर जगह मौजूद रहते हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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