तुम्हारे बाद भी तुम
तुम्हारे बाद भी तुम
तुम्हें शायद कभी मालूम न हो,
कि तुमसे मिलने के बाद
मेरी दुनिया में कोई बड़ा इन्क़िलाब नहीं आया।
बस...
कुछ बहुत छोटी-छोटी चीज़ें बदल गईं।
अब शामें पहले से ज़्यादा देर तक ठहरती हैं।
चाय की भाप में
किसी का चेहरा बनने लगा है।
बारिश की पहली बूँद
अब सीधे ज़मीन पर नहीं गिरती,
पहले दिल पर गिरती है।
तुमने कभी कोई वादा नहीं किया।
मैंने भी कोई क़सम नहीं माँगी।
फिर भी न जाने क्यों
तुम्हारी मौजूदगी,
मेरी तन्हाई की सबसे भरोसेमंद हमसफ़र बन गई।
तुम्हारा नाम
अब किसी पुकार की तरह नहीं आता,
एक दुआ की तरह उतरता है।
धीरे...
बहुत धीरे...
जैसे फ़ज्र से पहले
आसमान पर उजाला उतरता है।
मुझे तुमसे मिलने की उतनी ख़्वाहिश नहीं,
जितनी तुम्हारे होने की तसल्ली है।
तुम कहीं हो...
बस यही एहसास
मेरे कई उदास दिनों को
बेआवाज़ सहारा दे देता है।
मुहब्बत शायद यही होती है।
किसी को हासिल कर लेना नहीं,
बल्कि उसके वजूद से
अपनी रूह का रिश्ता जोड़ लेना।
ऐसा रिश्ता,
जिसे न फ़ासले कमज़ोर करते हैं,
न वक़्त।
मैंने तुम्हें
अपनी ज़िंदगी की किताब में
किसी अध्याय की तरह नहीं रखा।
तुम तो वह सफ़ेद सफ़्हा हो,
जिस पर मैं जब भी नज़र डालता हूँ,
हर बार
एक नई इबारत दिखाई देती है।
अगर कभी
ज़िंदगी की भीड़ में
हम एक-दूसरे से बिछड़ भी जाएँ,
तो मुझे यक़ीन है—
तुम्हारी याद
मुझे ढूँढ़ ही लेगी।
क्योंकि कुछ लोग
हमारे साथ नहीं रहते,
हमारे भीतर रहने लगते हैं।
और जो भीतर बस जाए,
वह जुदा कहाँ होता है?
वह तो...
साँसों की तरह
नज़र नहीं आता,
मगर हर पल
हमारे साथ रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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