चिंतन - क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है?
चिंतन - क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है?
ज्ञान मनुष्य को बहुत कुछ दे सकता है—तर्क, प्रमाण, विवेक, उपलब्धियाँ और प्रतिष्ठा। परंतु एक प्रश्न मेरे भीतर अक्सर देर तक ठहरा रहता है—यदि ज्ञान मनुष्य को अधिक विनम्र, अधिक सहृदय और अधिक मानवीय न बना सके, तो क्या वह वास्तव में ज्ञान है?
यहीं से एक विचार जन्म लेता है—क्या करुणा ज्ञान का सबसे परिपक्व रूप है?
ज्ञान का पहला चरण जानना है।
दूसरा समझना।
और अंतिम—अनुभव करना।
पर करुणा इन तीनों से भी आगे की अवस्था है। वहाँ हम केवल किसी का दुःख नहीं जानते, उसे समझते भी नहीं; हम उसे अपने भीतर महसूस करने लगते हैं। यही वह क्षण है जहाँ ज्ञान हृदय का रूप ले लेता है।
सूखी धरती पर वर्षा का कोई सिद्धांत काम नहीं आता; वहाँ पानी चाहिए। उसी प्रकार जीवन में ऐसे अनेक क्षण आते हैं, जहाँ तर्क हार जाते हैं और करुणा जीत जाती है।
किसी रोते हुए बच्चे को दर्शन नहीं चाहिए, माँ की गोद चाहिए।
किसी शोकाकुल व्यक्ति को शास्त्रों के उद्धरण नहीं चाहिए, किसी का मौन स्पर्श चाहिए।
किसी अकेले मनुष्य को सलाह नहीं चाहिए, साथ चाहिए।
शायद इसी का नाम करुणा है।
करुणा दया नहीं है।
दया ऊपर खड़े होकर नीचे देखने की दृष्टि है।
करुणा बराबरी पर बैठकर दूसरे के दुःख में सहभागी होने की क्षमता है।
दया में दूरी होती है।
करुणा में निकटता।
यही कारण है कि करुणा में अहंकार नहीं टिकता। जैसे ही मनुष्य स्वयं को दूसरे से बड़ा समझने लगता है, करुणा धीरे-धीरे दया में बदल जाती है।
ज्ञान भी ऐसा ही है।
जब वह अहंकार बनता है, तो विभाजन करता है।
जब वह करुणा बनता है, तो जोड़ता है।
शायद इसीलिए संसार के महानतम ज्ञानी अपने ज्ञान से नहीं, अपनी करुणा से पहचाने गए।
उन्होंने मनुष्यों को चमत्कारों से अधिक सहानुभूति दी।
उन्होंने सिद्धांतों से अधिक संवेदना दी।
उन्होंने विजय से अधिक विनम्रता सिखाई।
क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य का सबसे गहरा घाव अज्ञान नहीं, अकेलापन है।
और अकेलेपन का उपचार केवल करुणा कर सकती है।
मुझे कभी-कभी लगता है कि करुणा वह दृष्टि है, जिसमें हम दूसरे को वस्तु नहीं, स्वयं का विस्तार मानने लगते हैं। तब किसी का दुःख केवल उसका नहीं रह जाता। किसी का अपमान केवल उसका नहीं रह जाता। किसी की भूख, किसी का भय, किसी की असफलता—सब कुछ हमारे भीतर भी एक हलचल पैदा करने लगता है।
यही मनुष्यता है।
नदी यह नहीं पूछती कि कौन-सा खेत उसका अपना है। वह जहाँ तक पहुँच सकती है, वहाँ तक जल पहुँचा देती है। सूर्य यह नहीं देखता कि कौन उसका उपासक है। वह सब पर समान रूप से प्रकाश देता है।
प्रकृति का प्रत्येक उदार तत्व करुणा का पाठ पढ़ाता है।
मनुष्य ही है, जिसने करुणा को शर्तों में बाँध दिया है।
"यदि वह योग्य होगा, तो सहायता करूँगा।"
"यदि उसने मेरे साथ अच्छा किया होगा, तभी उसके साथ अच्छा करूँगा।"
पर करुणा का स्वभाव लेन-देन नहीं है।
वह अस्तित्व की सहज अभिव्यक्ति है।
एक वृक्ष फल देते समय यह नहीं सोचता कि किसने उसकी छाया में विश्राम किया था। वह इसलिए फल देता है क्योंकि फल देना उसके होने का स्वभाव है।
शायद करुणा भी मनुष्य के होने का स्वभाव है; केवल हमारा अहंकार उसे ढँक देता है।
विज्ञान हमें बता सकता है कि आँसू कैसे बनते हैं।
मनोविज्ञान बता सकता है कि वे क्यों बहते हैं।
पर करुणा ही वह हाथ है, जो आँसू पोंछता है।
यहीं ज्ञान अपनी अंतिम परीक्षा देता है।
यदि किसी विद्वान की विद्वत्ता उसके आसपास के लोगों को अधिक भयभीत कर दे, अधिक छोटा महसूस करा दे, तो वह ज्ञान अभी अपरिपक्व है। पर यदि उसकी उपस्थिति में लोग स्वयं को अधिक सुरक्षित, अधिक सम्मानित और अधिक मानवीय महसूस करें, तो समझना चाहिए कि ज्ञान ने करुणा का रूप धारण कर लिया है।
और शायद ज्ञान की यही पूर्णता है।
अंततः संसार को सबसे अधिक आवश्यकता नए सिद्धांतों की नहीं, नए हृदयों की है।
ऐसे हृदय, जो जानने के बाद महसूस भी कर सकें।
समझने के बाद झुक भी सकें।
और सत्य को पाने के बाद उसे दूसरों पर थोपने के बजाय, उसके प्रकाश में सबके लिए स्थान बना सकें।
तभी लगता है कि ज्ञान की अंतिम मंज़िल पुस्तकालय नहीं, हृदय है।
जहाँ तर्क अपनी सीमा स्वीकार कर लेता है, वहीं से करुणा का आरंभ होता है।
और शायद इसलिए—
ज्ञान मनुष्य को बुद्धिमान बनाता है, पर करुणा उसे मनुष्य बनाती है।
— मुकेश
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