उस शाम का ज़िक्र मैंने किसी से नहीं किया।
दिन बीतते गए। उस शाम का ज़िक्र मैंने किसी से नहीं किया। आख़िर बताता भी क्या? कि कोई आया था, कुछ देर बैठा रहा था और फिर चला गया था? ऐसी घटनाएँ सुनने में जितनी मामूली लगती हैं, भीतर उतनी ही गहरी जगह घेर लेती हैं।
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