दिन बीतते गए। उस शाम का ज़िक्र मैंने किसी से नहीं किया। आख़िर बताता भी क्या? कि कोई आया था, कुछ देर बैठा रहा था और फिर चला गया था? ऐसी घटनाएँ सुनने में जितनी मामूली लगती हैं, भीतर उतनी ही गहरी जगह घेर लेती हैं।
मगर अजीब बात यह थी कि उसके जाने के बाद मैं उसे कम और उस शाम को ज़्यादा याद करने लगा। जैसे किसी किताब का किरदार धुँधला पड़ जाए, लेकिन उसकी छोड़ी हुई रोशनी पन्नों पर बनी रहे।
कई दिनों तक जब भी शाम उतरती, मैं अनायास खिड़की की तरफ़ देख लेता। सड़क पर चलते हुए लोगों में, दूर जाती हुई परछाइयों में, कभी-कभी उसकी चाल का कोई आभास मिलता। फिर तुरंत समझ में आ जाता कि यह सिर्फ़ याद की एक शरारत है। यादें अक्सर हमें वही दिखाती हैं जिसकी हमें कमी होती है।
धीरे-धीरे मुझे यह भी महसूस हुआ कि उस शाम में जो बात मुझे सबसे ज़्यादा छू गई थी, वह उसका होना नहीं था। वह यह एहसास था कि दो इंसान बिना किसी मक़सद, बिना किसी भूमिका के भी एक-दूसरे के पास बैठ सकते हैं। इस दुनिया में, जहाँ हर मुलाक़ात किसी वजह से होती है, वह शाम किसी वजह के बिना आई थी।
शायद इसी वजह से वह मेरे भीतर ठहर गई।
फिर एक दिन, बहुत दिनों बाद, मैं उसी कुर्सी पर बैठा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। खिड़की के शीशे पर पानी की बूँदें धीरे-धीरे फिसल रही थीं। अचानक मुझे लगा कि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में लौटने के लिए नहीं आते। वे सिर्फ़ यह बताने आते हैं कि हमारे भीतर अभी भी महसूस करने की गुंजाइश बची हुई है।
मैं देर तक बारिश देखता रहा।
अब उसकी याद में पहले जैसी उदासी नहीं थी। एक नरम-सी कृतज्ञता थी। जैसे किसी मुसाफ़िर ने सफ़र के दौरान थोड़ी देर मेरे पास बैठकर मेरा अकेलापन बाँट लिया हो और फिर अपनी राह चला गया हो।
और तब पहली बार मुझे लगा कि शायद हर बिछड़ना दुख नहीं होता।
कुछ बिछड़नें हमें हमारे ही भीतर थोड़ा और गहरा छोड़ जाती हैं।
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