रात काफ़ी गुज़र चुकी थी। घर की सारी आवाज़ें एक-एक करके सो गई थीं। घड़ी की टिक-टिक अब पहले से ज़्यादा साफ़ सुनाई दे रही थी। मैं बिस्तर पर लेटा था, लेकिन नींद कहीं और थी।
ऐसे ही वक़्तों में आदमी को लोगों की नहीं, उनकी मौजूदगी की याद आती है। मुझे उसका चेहरा याद नहीं आ रहा था, उसकी बातें भी नहीं। बस यह याद था कि वह मेरे सामने बैठा था और दुनिया कुछ देर के लिए कम जटिल हो गई थी।
मैंने सोचा, कितनी अजीब बात है कि हम अक्सर उन लोगों को याद करते हैं जिन्होंने हमें बहुत कुछ दिया हो—मोहब्बत, तकलीफ़, उम्मीद या धोखा। मगर कभी-कभी कोई शख़्स सिर्फ़ कुछ घंटे की ख़ामोशी देकर चला जाता है और बरसों तक याद रहता है।
खिड़की के बाहर रात अपनी पूरी स्याही के साथ फैली हुई थी। दूर किसी मकान की छत पर एक पीला-सा बल्ब जल रहा था। उसे देखते हुए मुझे लगा कि इंसान भी शायद ऐसे ही होते हैं—एक-दूसरे की अँधेरी रातों में दूर से दिखाई देते छोटे-छोटे उजाले। न इतने क़रीब कि सारी तन्हाई मिटा दें, न इतने दूर कि बिल्कुल नज़र ही न आएँ।
सुबह जब आँख खुली तो कमरे में धूप थी। वही मेज़, वही किताबें, वही कुर्सी। सब कुछ अपनी जगह पर था। मगर पिछली शाम अब एक घटना नहीं रही थी; वह एक स्मृति बन चुकी थी। उन स्मृतियों की तरह, जो किसी पुराने ख़त में रखे सूखे फूल की तरह सालों बाद भी अपनी हल्की-सी ख़ुशबू बचाए रखती हैं।
मैंने चाय बनाई और अनायास दूसरी प्याली भी निकाल ली। फिर मुस्कुरा कर उसे वापस रख दिया।
कुछ आदतें बहुत जल्दी बन जाती हैं।
और कुछ अनुपस्थितियाँ उससे भी जल्दी।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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