वह चला गया तो मैं कुछ देर उसी कुर्सी को देखता रहा जिस पर वह बैठा था। कुर्सियाँ भी अजीब होती हैं; उन पर बैठे हुए लोग चले जाते हैं, मगर उनकी मौजूदगी कुछ देर तक वहाँ ठहरी रहती है। जैसे हवा को अभी यक़ीन न आया हो कि कोई उठकर जा चुका है।
खिड़की के बाहर शाम अब लगभग रात में बदल चुकी थी। सामने वाली इमारत की कुछ खिड़कियों में रोशनियाँ जल उठी थीं। दूर कहीं किसी बच्चे के हँसने की आवाज़ आई और फिर सब कुछ वैसा ही शांत हो गया। मैंने मेज़ पर रखे दो कपों की तरफ़ देखा। चाय कब की ठंडी हो चुकी थी।
मुझे याद नहीं कि उस शाम हमने क्या कहा था, लेकिन यह आज भी याद है कि हम कैसे चुप रहे थे। कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में बातें बनकर नहीं आते; वे एक एहसास की तरह आते हैं। उनकी मौजूदगी का कोई साफ़ अर्थ नहीं होता, फिर भी उनके चले जाने के बाद एक खाली जगह पैदा हो जाती है, जिसका नाम रखना मुश्किल होता है।
मैंने खिड़की बंद की और कमरे की बत्ती जला दी। उजाला फैल गया, मगर न जाने क्यों लगा कि शाम अभी ख़त्म नहीं हुई है। जैसे उसका एक हिस्सा कहीं कमरे में रह गया हो—किताबों के बीच, कुर्सी की पीठ पर, या शायद मेरे भीतर किसी ऐसी जगह जहाँ स्मृतियाँ धीरे-धीरे जाकर बसती हैं।
उस रात देर तक नींद नहीं आई। कोई बेचैनी भी नहीं थी, कोई दुख भी नहीं। बस एक धुँधला-सा ख़याल बार-बार आता रहा कि कुछ मुलाक़ातें रिश्तों की तरह नहीं होतीं। वे मौसम की तरह होती हैं—आती हैं, ठहरती हैं, और चली जाती हैं। मगर जाते-जाते हमारे भीतर का तापमान बदल देती हैं।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment