वो मेरे पास पूरी शाम बैठा रहा।
न उसने कोई ख़ास बात की, न मैंने। कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी थी जो बोझ नहीं लगती थी। खिड़की से उतरती हुई शाम धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी और हम दोनों उसे चुपचाप देखते रहे। कभी उसकी निगाह बाहर ठहर जाती, कभी मेरी तरफ़ उठती और फिर किसी अनजाने ख़याल में डूब जाती।
मुझे बार-बार लगता रहा कि कुछ कहा जाएगा, कोई पुरानी बात छिड़ेगी, कोई भूली हुई याद अपना नाम बताएगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ वक़्त था जो हमारे दरमियान से बहुत आहिस्ता-आहिस्ता गुज़रता रहा।
फिर वह अचानक उठ खड़ा हुआ। दरवाज़े तक गया, पल भर ठहरा और बहुत मामूली-सी आवाज़ में बोला—"चलता हूँ।"
बस इतना ही।
उसके जाने के बाद मुझे पहली बार कमरे की ख़ामोशी सुनाई दी। अभी कुछ देर पहले यही ख़ामोशी उसके साथ थी, अब वही ख़ामोशी मेरे साथ रह गई थी। कमरा वैसा ही था, शाम भी वैसी ही थी, मगर न जाने क्यों मुझे लगा जैसे कोई चीज़ मेरे भीतर से उठकर उसके साथ चली गई हो। और जो बचा था, वह एक हल्की-सी उदासी नहीं, बल्कि किसी अनुपस्थिति का लंबा, गहरा एहसास था।
मुकेश ,,,,,,,,।
न उसने कोई ख़ास बात की, न मैंने। कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी थी जो बोझ नहीं लगती थी। खिड़की से उतरती हुई शाम धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी और हम दोनों उसे चुपचाप देखते रहे। कभी उसकी निगाह बाहर ठहर जाती, कभी मेरी तरफ़ उठती और फिर किसी अनजाने ख़याल में डूब जाती।
मुझे बार-बार लगता रहा कि कुछ कहा जाएगा, कोई पुरानी बात छिड़ेगी, कोई भूली हुई याद अपना नाम बताएगी। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सिर्फ़ वक़्त था जो हमारे दरमियान से बहुत आहिस्ता-आहिस्ता गुज़रता रहा।
फिर वह अचानक उठ खड़ा हुआ। दरवाज़े तक गया, पल भर ठहरा और बहुत मामूली-सी आवाज़ में बोला—"चलता हूँ।"
बस इतना ही।
उसके जाने के बाद मुझे पहली बार कमरे की ख़ामोशी सुनाई दी। अभी कुछ देर पहले यही ख़ामोशी उसके साथ थी, अब वही ख़ामोशी मेरे साथ रह गई थी। कमरा वैसा ही था, शाम भी वैसी ही थी, मगर न जाने क्यों मुझे लगा जैसे कोई चीज़ मेरे भीतर से उठकर उसके साथ चली गई हो। और जो बचा था, वह एक हल्की-सी उदासी नहीं, बल्कि किसी अनुपस्थिति का लंबा, गहरा एहसास था।
मुकेश ,,,,,,,,
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