जो बातें कभी कही नहीं गईं
अब मुझे उन बातों का अफ़सोस नहीं होता जो मैंने कह दी थीं।
अफ़सोस उन बातों का होता है जो कही जा सकती थीं और नहीं कही गईं।
उम्र के इस पड़ाव पर आकर आदमी समझने लगता है कि जीवन की सबसे गहरी कहानियाँ शब्दों में नहीं लिखी जातीं। वे उन वाक्यों के बीच रहती हैं जिन्हें हम अधूरा छोड़ देते हैं। उन ख़तों में जो कभी भेजे नहीं गए। उन फ़ोन कॉलों में जो मिलाए तो गए, मगर आख़िरी बटन दबाने की हिम्मत नहीं हुई।
मुझे याद नहीं कि मैंने जीवन में कितने लोगों से क्या-क्या कहा। लेकिन मुझे यह अच्छी तरह याद है कि किन लोगों के सामने मैं कुछ कह नहीं पाया।
कभी संकोच था, कभी अहंकार।
कभी यह भ्रम कि अभी बहुत वक़्त है।
और वक़्त से बड़ा छलिया शायद कोई नहीं।
वह हमेशा हमें यह यक़ीन दिलाता रहता है कि जो आज नहीं हुआ, वह कल हो जाएगा।
मगर जीवन में बहुत-सी चीज़ें कल तक पहुँचते-पहुँचते अपना अर्थ खो देती हैं।
एक माफ़ी।
एक धन्यवाद।
एक स्वीकार।
एक प्रेम।
इनकी भी अपनी ऋतुएँ होती हैं।
समय पर कह दिए जाएँ तो फूल बन जाते हैं।
देर हो जाए तो सूखे पत्तों की तरह बिखर जाते हैं।
अब कभी-कभी शाम को अकेले बैठा मैं उन लोगों के बारे में सोचता हूँ जिनसे जीवन ने मेरा परिचय कराया था।
कितनों को मैंने ठीक से जाना ही नहीं।
कितनों ने मुझे शायद ग़लत समझा होगा।
कितनों के बारे में मेरी राय अधूरी रही होगी।
और कितने ऐसे होंगे जो मेरी स्मृति में अब भी वैसे ही जीवित हैं जैसे किसी पुराने फ़ोटो में रहते हैं—एक ही उम्र, एक ही मुस्कान, एक ही क्षण में स्थिर।
शायद हम सब एक-दूसरे के जीवन में अधूरी पांडुलिपियों की तरह प्रवेश करते हैं।
कोई किसी को पूरा नहीं पढ़ पाता।
किसी के कुछ अध्याय छूट जाते हैं, किसी के कुछ पन्ने फट जाते हैं, किसी की आख़िरी पंक्ति तक पहुँचने से पहले ही किताब बंद हो जाती है।
फिर भी हम उन अधूरी किताबों को सँभालकर रखते हैं।
क्योंकि मनुष्य को पूर्णता नहीं, अर्थ चाहिए।
और अर्थ अक्सर वहीं जन्म लेता है जहाँ कुछ अनकहा रह जाता है।
इसलिए अब जब कोई बात मन में उठती है, मैं उसे तुरंत कह देने की जल्दी भी नहीं करता।
और उसे हमेशा के लिए दबा देने की ज़िद भी नहीं करता।
मैं बस उसे अपने भीतर थोड़ी देर बैठने देता हूँ।
जैसे कोई पुराना मेहमान आया हो।
कुछ बातें कही जाने के लिए नहीं होतीं।
वे सिर्फ़ हमारे भीतर रहने के लिए आती हैं।
और धीरे-धीरे हमारी ख़ामोशी का हिस्सा बन जाती हैं।
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