होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 31 May 2026

कुछ चीज़ें लौटकर नहीं आतीं

 कुछ चीज़ें लौटकर नहीं आतीं

एक उम्र के बाद आदमी को यह समझ में आने लगता है कि जीवन में सबसे बड़ी सच्चाई परिवर्तन नहीं, अपूर्ण वापसी है।

बहुत-सी चीज़ें लौटती तो हैं, मगर वैसी नहीं लौटतीं जैसी गई थीं।

बारिश लौटती है, लेकिन बचपन वाली बारिश नहीं।

घर लौटते हैं, लेकिन उनमें रहने वाले लोग बदल चुके होते हैं।

पुरानी गलियाँ वहीं रहती हैं, मगर उन्हें देखने वाली आँखें वैसी नहीं रहतीं।

और कभी-कभी हम ख़ुद भी लौटते हैं—किसी शहर में, किसी स्मृति में, किसी रिश्ते में—लेकिन वहाँ पहुँचकर पता चलता है कि जिस जगह को हम खोज रहे थे, वह अब केवल हमारे भीतर मौजूद है।

मुझे याद है, एक बार वर्षों बाद मैं एक पुराने मोहल्ले से गुज़रा था।

सड़क वही थी।

पेड़ भी लगभग वही थे।

कुछ मकान रंग बदल चुके थे, कुछ गिराकर नए बना दिए गए थे।

मैं बहुत देर तक वहाँ खड़ा रहा, जैसे किसी परिचित चेहरे में पुराने आदमी को तलाश रहा हूँ।

फिर अचानक समझ में आया कि बदलाव मोहल्ले में नहीं, मुझमें हुआ है।

जिसे मैं खोज रहा था, वह दरअसल वह समय था जो वहाँ कभी गुज़रा था।

और समय किसी पते पर नहीं रहता।

वह सिर्फ़ स्मृति में रहता है।

शायद इसी कारण कुछ मुलाक़ातें हमें बेचैन कर देती हैं।

हम सोचते हैं कि हम किसी व्यक्ति से मिलने जा रहे हैं, जबकि भीतर-ही-भीतर हम अपने पुराने दिनों से मिलने निकलते हैं।

और जब वे दिन नहीं मिलते, तो एक अजीब-सी ख़ाली जगह मन में रह जाती है।

अब मुझे इस बात का दुख कम होता है।

शायद इसलिए कि मैंने स्वीकार कर लिया है कि जीवन का सौंदर्य स्थायित्व में नहीं, क्षणभंगुरता में है।

फूल अगर हमेशा खिले रहें तो उन्हें देखकर विस्मय नहीं होगा।

संध्या अगर कभी रात में न बदले तो उसका रंग इतना गहरा नहीं लगेगा।

और लोग अगर हमेशा हमारे साथ रहें, तो शायद हम उनकी उपस्थिति का अर्थ ही भूल जाएँ।

इसलिए अब जब कोई स्मृति लौटती है, मैं उसे रोकने की कोशिश नहीं करता।

मैं उसे आने देता हूँ।

वह कुछ देर मेरे पास बैठती है, पुराने दिनों की थोड़ी-सी धूप कमरे में बिखेरती है, और फिर चली जाती है।

मैं उसे जाते हुए देखता हूँ।

बिना किसी शिकायत के।

क्योंकि अब मैं जानता हूँ कि जीवन में कुछ चीज़ें लौटकर नहीं आतीं।

मुकेश ,,,,,,,,,,,



No comments:

Post a Comment