उदासी का अपना एक प्रकाश होता है
बहुत समय तक मुझे लगता रहा कि उदासी एक अँधेरा है, जिससे जितनी जल्दी हो सके बाहर निकल आना चाहिए। लेकिन अब कभी-कभी लगता है कि उदासी अँधेरा नहीं, एक अलग तरह की रोशनी है।
उसमें चीज़ें तेज़ नहीं दिखतीं, मगर गहरी दिखती हैं।
ख़ुशी के दिनों में हम जीवन को जीते हैं। उदासी के दिनों में उसे समझते हैं।
शायद इसी कारण कुछ स्मृतियाँ हमेशा हल्की उदासी के साथ लौटती हैं। वे हमें दुख देने नहीं आतीं। वे बस यह याद दिलाने आती हैं कि हम कभी किसी चीज़ से सचमुच जुड़े थे।
मुझे उन दिनों की याद आती है जब जीवन इतना व्यस्त नहीं था। जब शामें सिर्फ़ शामें हुआ करती थीं। उनका कोई उपयोग नहीं होता था। वे किसी लक्ष्य की ओर नहीं जाती थीं। वे बस आती थीं और धीरे-धीरे घर में फैल जाती थीं।
हम खिड़कियों के पास बैठते थे, बिना किसी विशेष कारण के।
कभी कोई किताब खुली रहती, कभी कोई बातचीत अधूरी चलती रहती।
और कभी-कभी कुछ भी नहीं होता था।
आज सोचता हूँ, शायद वही "कुछ नहीं" सबसे मूल्यवान था।
अब हर क्षण को भर देने की एक बेचैनी है। हर ख़ामोशी पर कोई आवाज़ रख दी गई है। हर अकेलेपन के लिए कोई स्क्रीन मौजूद है।
मगर मनुष्य का मन इतनी आसानी से नहीं भरता।
उसके भीतर एक पुराना कमरा है जहाँ अब भी सन्नाटा पसरा रहता है।
और जब कभी जीवन की भागदौड़ थोड़ी धीमी पड़ती है, हम अनायास उसी कमरे में पहुँच जाते हैं।
वहाँ बैठकर मुझे अक्सर लगता है कि उदासी का संबंध खोने से कम और याद रखने से ज़्यादा है।
जिसे हम पूरी तरह भूल चुके होते हैं, वह हमें उदास नहीं करता।
उदास वही करता है जो अब भी कहीं जीवित है।
कोई व्यक्ति।
कोई घर।
कोई रास्ता।
कोई शाम।
या अपने ही जीवन का कोई पुराना रूप।
कभी-कभी मुझे अपने पुराने स्वरूप की याद आती है। वह जो भविष्य को लेकर उत्सुक था। जो लोगों पर जल्दी विश्वास कर लेता था। जो हर नए चेहरे में एक कहानी देख लेता था।
वह आदमी अब भी कहीं मेरे भीतर है, लेकिन बहुत धीमी आवाज़ में बोलता है।
मैं उसकी बात सुनने की कोशिश करता हूँ।
और तब समझ में आता है कि उम्र बढ़ना सिर्फ़ आगे बढ़ना नहीं है।
यह अपने भीतर छूट गए लोगों से मिलते रहने की प्रक्रिया भी है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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