उसके जाने के बाद

 उसके जाने के बाद कई दिनों तक मैं यह समझता रहा कि मुझे उसकी कमी महसूस हो रही है। फिर एक दिन अचानक एहसास हुआ कि मैं ग़लत था।

मुझे उसकी नहीं, अपने उस रूप की कमी महसूस हो रही थी जो उसकी मौजूदगी में पैदा हुआ था।

वह शाम जैसे मेरे भीतर किसी बंद कमरे का दरवाज़ा खोल गई थी। एक ऐसा कमरा जहाँ मैं बरसों से गया नहीं था। वहाँ कुछ अधूरी बातें थीं, कुछ पुराने ख़्वाब, कुछ चेहरे जिनके नाम अब ठीक-ठीक याद नहीं थे। और एक अजीब-सी ख़ामोशी थी, जो उम्र के साथ जमा होती चली जाती है।

हम अक्सर समझते हैं कि लोग हमें बदलते हैं। लेकिन सच यह है कि ज़्यादातर लोग सिर्फ़ हमें हमसे मिलवाते हैं।

उस शाम भी शायद ऐसा ही हुआ था।

वह मेरे सामने बैठा था और मैं, जाने कब से, अपने सामने बैठा हुआ था।

उसके जाने के बाद मैंने अपने भीतर एक हल्की-सी हरकत महसूस की। जैसे किसी सूखे कुएँ में बहुत नीचे कहीं पानी ने करवट ली हो। कोई बड़ा परिवर्तन नहीं था। जीवन वैसा ही था—सुबह की चाय, दोपहर की थकान, शाम की वापसी, रात की नींद। मगर इन सबके बीच एक महीन-सी दरार पड़ गई थी, जिससे कभी-कभी रोशनी भीतर चली आती थी।

फिर एक दिन मैं बाज़ार में था। लोगों की भीड़ थी, दुकानों की आवाज़ें थीं, गाड़ियों का शोर था। अचानक मुझे उसका ख़याल आया। और उसी क्षण मैंने महसूस किया कि मैं उसे याद नहीं कर रहा था। मैं सिर्फ़ उस सुकून को याद कर रहा था जो उसकी ख़ामोशी ने मुझे दिया था।

तब मुझे पहली बार यह समझ में आया कि कुछ लोग हमारे जीवन में प्रेम की तरह नहीं आते।

वे विराम की तरह आते हैं।

एक लंबे वाक्य के बीच रखा हुआ छोटा-सा विराम।

वाक्य उसके बाद भी चलता रहता है, जीवन भी।

मगर उस एक ठहराव के बिना उसका अर्थ वैसा नहीं रहता।

उस रात मैंने बहुत दिनों बाद अपनी पुरानी डायरी खोली। कुछ नहीं लिखा। बस आख़िरी खाली पन्ने पर तारीख़ डाल दी और देर तक उसे देखता रहा।

कभी-कभी लिखना ज़रूरी नहीं होता।

कभी-कभी सिर्फ़ यह जान लेना काफ़ी होता है कि कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई है।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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