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Sunday, 31 May 2026

कुछ आदतें याद रह जाती हैं

 कभी-कभी मुझे लगता है कि हम जिन लोगों को याद करते हैं, वे लोग नहीं होते, वे हमारे जीवन के कुछ मौसम होते हैं।

एक समय था जब मैं हर बिछड़ने को एक घटना समझता था। अब लगता है, बिछड़ना कोई घटना नहीं, एक धीमी प्रक्रिया है। वह उसी दिन शुरू हो जाती है जिस दिन हम किसी के आदी होने लगते हैं।

आदमी दरअसल लोगों का नहीं, उनकी मौजूदगी के ढंग का आदी होता है।

किसी का चाय पीते हुए खिड़की की तरफ़ देखना, किसी का बात करते-करते अचानक चुप हो जाना, किसी का हँसते वक़्त आँखें झुका लेना। ये छोटी-छोटी बातें ही तो हैं जो बाद में सबसे ज़्यादा याद आती हैं।

मुझे अब नाम याद नहीं रहते।

चेहरे भी धीरे-धीरे धुँधले पड़ जाते हैं।

मगर कुछ आदतें याद रह जाती हैं, कुछ आवाज़ें, कुछ शामें।

और फिर एक दिन आदमी अपनी ही स्मृतियों के बीच बैठा सोचता है कि आख़िर किस चीज़ का शोक मना रहा है।

उस व्यक्ति का?

या उस समय का, जो उसके साथ चला गया?

शायद हम उम्र के एक मुक़ाम पर पहुँचकर लोगों को नहीं खोते, अपने हिस्से की कुछ संभावनाएँ खोते हैं।

कुछ रास्ते जो उनके साथ खुल सकते थे।

कुछ वाक्य जो कहे जा सकते थे।

कुछ चिट्ठियाँ जो लिखी जा सकती थीं।

मगर जीवन का सौंदर्य भी शायद इसी में है कि वह अधूरा रहता है।

अगर सब कुछ पूरा हो जाए तो स्मृतियाँ कहाँ जन्म लेंगी?

मैंने देखा है, जो लोग पूरी तरह मिल जाते हैं, वे अक्सर कहानी नहीं बनते।

कहानियाँ वहीं जन्म लेती हैं जहाँ कुछ बाकी रह जाता है।

एक शब्द।

एक स्पर्श।

एक शाम।

या किसी का यूँ ही बिना वजह देर तक पास बैठा रहना।

अब जब कभी शाम ढलती है, मैं किसी का इंतज़ार नहीं करता।

मगर खिड़की के बाहर उतरती हुई रोशनी को देखता हूँ तो लगता है कि जीवन ने जो कुछ दिया, उसमें सबसे कीमती वे लोग नहीं थे जो ठहर गए।

वे थे जो थोड़ी देर ठहरे, और जाते-जाते मुझे मेरे बारे में कुछ बता गए।

मुकेश ,,,,,,,,,,

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