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Wednesday, 29 April 2026

खंड — 5 : जहाँ साक्षी भी नहीं रहता

 खंड — 5 : जहाँ साक्षी भी नहीं रहता

दोपहर का समय था

पर यह कहना भी शायद ठीक नहीं,

क्योंकि वहाँ समय किसी घड़ी की तरह नहीं,

एक फैली हुई धूप की तरह था

जो किसी एक दिशा से नहीं आती,

बस हर ओर बराबर बिखरी रहती है।


घाटी वैसी ही थी

पत्थरों पर जमी महीन धूल,

जिसे छूने भर से

वह हवा में नहीं उड़ती,

बस उँगलियों की लकीरों में चिपक जाती है।


कुछ सूखे पेड़ थे

उनकी शाखाएँ ऐसी मुड़ी हुईं,

जैसे वे हवा से नहीं,

किसी पुरानी आदत से झुकी हों।


दूर, बहुत दूर,

एक चिड़िया ने आवाज़ दी

पर वह आवाज़

यहाँ तक आते-आते

किसी पहचान में नहीं रही।


तुम वहाँ थे

या शायद नहीं भी थे।


यह तय करना कठिन था

क्योंकि “होना” अब

किसी शरीर या विचार से नहीं जुड़ा था।


पहले जो कुछ भी घटता था,

वह तुम्हारे इर्द-गिर्द घटता था

जैसे हर दृश्य का कोई केंद्र हो,

जहाँ से अर्थ निकलता है।


अब दृश्य थे

पर केंद्र नहीं था।


एक पत्थर ढलान से

धीरे-धीरे लुढ़का

उसकी गति में कोई हड़बड़ी नहीं थी,

जैसे उसे कहीं पहुँचना न हो।


पहले तुम उसे देखते

और “देखना” एक क्रिया होती।


अब वह पत्थर लुढ़कता रहा

पर “देखा जाना”

किसी क्रिया की तरह उपस्थित नहीं था।


फिर भी,

कुछ था

जो अनुपस्थित भी नहीं था।


वह ऐसा था

जैसे किसी कमरे में

कोई न हो,

पर खिड़की खुली रह जाए

और पर्दा हल्का-सा हिलता रहे।


तुम्हारी साँस

अगर वह अब भी तुम्हारी थी

बिना किसी लय के चल रही थी।


न गहरी,

न उथली।


जैसे शरीर ने

अपने आप को

अपने हाल पर छोड़ दिया हो।


किसी क्षण

या जो भी वह था

तुम्हें लगा

कि अब कोई “तुम” नहीं बचा

जो इस सबको जोड़ सके।


और अजीब बात यह थी

कि इसमें कोई भय नहीं था।


डर हमेशा

किसी के खो जाने का होता है

पर यहाँ

कोई “कोई” था ही नहीं।


घाटी अब भी थी,

धूप अब भी थी,

पत्थर, पेड़, हवा

सब अपनी-अपनी जगह।


पर वे किसी के “लिए” नहीं थे।


वे बस थे।


और शायद

यही वह जगह है

जहाँ “साक्षी” भी

एक अनावश्यक शब्द हो जाता है


क्योंकि वहाँ

न देखने वाला बचता है,

न देखा जाने वाला।


केवल एक फैलाव

इतना शांत,

इतना साधारण,

कि उसे असाधारण कह देना भी

थोड़ा-सा अतिशयोक्ति लगता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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