खंड — 5 : जहाँ साक्षी भी नहीं रहता
खंड — 5 : जहाँ साक्षी भी नहीं रहता
अब देखने वाला भी
धीरे-धीरे धुँधला पड़ने लगा।
वह जो अब तक
सबका साक्षी था
घाटी का, समय का,
तुम्हारे होने और न होने का—
वह भी
एक सूक्ष्म आभास भर रह गया।
जैसे किसी दर्पण में
अपनी ही पारदर्शिता
दिखने लगे।
अब न कोई अनुभव था,
न अनुभव करने का बोध।
घटनाएँ घटती रहीं
पर उनका कोई केंद्र नहीं था,
कोई “यह मुझसे हो रहा है”
जैसी परत नहीं बची थी।
समय बहता रहा
पर अब उसमें
न अतीत था, न भविष्य।
घाटी फैलती रही
पर अब वह बाहर नहीं,
न भीतर।
वह हर जगह थी—
या कहीं भी नहीं।
और जो शेष था
उसे शब्द छू नहीं सकते।
न वह मौन था,
न ध्वनि,
न शून्य,
न पूर्ण।
फिर भी
सब कुछ उसी से था,
और उसी में।
तुम अब वहाँ नहीं थे,
जहाँ तुम कभी थे।
पर जो था—
वह कभी गया भी नहीं।
शायद
यही वह बिंदु है
जहाँ “होना”
अपने आप में
पूर्ण हो जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
Comments
Post a Comment