खंड — 4 : साक्षी का जन्म
अब न तुमने पुकारा,
न समय ने कुछ कहा।
घाटी वैसी ही थी
पर उसमें जो घट रहा था,
वह अब दृश्य नहीं,
अनुभव था।
तुम्हारे भीतर
जो लगातार बोलता था
वह धीरे-धीरे
अपनी ही आवाज़ से थक गया।
विचार,
जो कभी तुम्हारी पहचान थे,
अब आने-जाने वाले मेहमान लगने लगे।
और उसी थकान की तह में
कुछ और खुला
कुछ जो न बोलता था,
न चुप रहता था।
वह बस देखता था।
तुमने उसे पहले भी महसूस किया था,
पर हर बार
किसी शब्द में बाँधने की कोशिश में
उसे खो दिया था।
इस बार तुमने कुछ नहीं किया
न समझने की कोशिश,
न पकड़ने की।
और वह स्पष्ट होता गया।
अब घाटी भी तुम नहीं थे,
समय भी तुम नहीं थे,
और जो “तुम” कहते थे—
वह भी धीरे-धीरे
एक घटना भर रह गया।
शेष क्या था?
एक देखना
बिना नाम का,
बिना केंद्र का।
जहाँ अनुभव घटता है,
पर कोई अनुभव करने वाला नहीं रहता।
वहीं
साक्षी जन्म लेता है
या शायद,
पहली बार पहचाना जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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