खंड — 3 : जब समय बोलता है

 खंड — 3 : जब समय बोलता है


तुमने इस बार पुकारा नहीं

सिर्फ़ खड़े रहे,

घाटी के किनारे,

जैसे किसी उत्तर की प्रतीक्षा में नहीं,

बल्कि उसकी अनुपस्थिति को समझने में।


और तभी

कुछ बदला।


हवा ने दिशा नहीं बदली,

पेड़ों ने सरसराना नहीं छोड़ा,

पर उस स्थिरता में

एक स्वर उभरा

धीमा, लगभग अदृश्य।


“तुम बहुत शोर करते हो,”

समय ने कहा।


तुम चौंके नहीं—

जैसे तुम हमेशा से जानते थे

कि एक दिन

ये ख़ामोशी बोल उठेगी।


“मैंने तुम्हें कभी रोका नहीं,”

वह स्वर फिर आया,

“तुम ही हर मोड़ पर

अपने ही अतीत में अटकते रहे।”


तुमने पहली बार

घाटी को नहीं,

अपने भीतर देखा।


वहाँ भी एक घाटी थी—

उतनी ही सूनी,

उतनी ही गहरी,

जहाँ तुम्हारी हर अधूरी पुकार

अब भी गूँज रही थी।


“तुम मुझे दोष देते हो,”

समय हँसा

“पर मैं तो सिर्फ़ बहता हूँ,

रुकना तुम्हारी आदत है।”


अब जो गूँज लौटी—

वो न तुम्हारी थी,

न घाटी की।


वो एक साक्षी थी—

जो देख रही थी

तुम्हें, समय को,

और उस दूरी को

जो कभी थी ही नहीं।


तुमने आँखें बंद कीं

और पहली बार

कुछ नहीं कहा।


क्योंकि अब

सुनना ही पर्याप्त था।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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