खंड — 2 : जो लौटकर आता है, वह कौन है?

 खंड — 2 : जो लौटकर आता है, वह कौन है?


तुमने फिर पुकारा

इस बार थोड़ा धीरे,

जैसे अब तुम्हें भरोसा न हो

कि कोई सुनेगा भी।


घाटी वैसी ही थी—

विस्तृत, निर्विकार,

समय की तरह निस्पृह।


तुम्हारी आवाज़

इस बार दूर तक नहीं गई,

वो तुम्हारे ही आसपास

कहीं गिर पड़ी

जैसे थककर बैठ गई हो।


और जो लौटा—

वो प्रतिध्वनि नहीं थी,

वो एक प्रश्न था।


“तुम किसे पुकार रहे हो?”


तुम ठहर गए।

पहली बार

तुम्हें अपनी ही आवाज़

अजनबी लगी।


क्या सचमुच

तुम किसी और को बुला रहे थे?

या तुमने हमेशा से

ख़ुद को ही आवाज़ दी थी

बस पहचान नहीं पाए?


घाटी चुप रही,

पर उस चुप्पी में

एक हल्की-सी स्वीकृति थी।


जैसे समय कह रहा हो—

“जो लौटकर आता है,

वो तुम हो…

पर वही नहीं,

जो तुम थे।”


मुकेश ,,,,,,,,

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