समय की सूनी घाटी — एक और अनुगूँज
कुछ लम्हे
बिना दस्तक दिए
तुम्हारे भीतर उतर जाते हैं
जैसे कोई पुराना नाम
धीरे से याद आ जाए।
तुम चलते रहते हो
पर रास्ते तुम्हें नहीं,
तुम्हारी थकान को पहचानते हैं
और कहीं अचानक
एक ख़ामोशी तुम्हें थाम लेती है।
तुम फिर पुकारते हो—
किसे, ये तुम भी नहीं जानते,
शायद किसी बीते हुए “तुम” को,
या किसी आने वाले “हम” को।
और जो लौटता है
वो वही नहीं होता
जो तुमने भेजा था,
वो थोड़ा टूटा हुआ,
थोड़ा बदला हुआ,
थोड़ा तुम्हारे जैसा हो जाता है।
समय की इस सूनी घाटी में
आवाज़ें मरती नहीं—
बस बदल जाती हैं
अनुगूँजों में।
सुनो,
ये जो लौटकर आता है न—
तुम्हारी ही तरह अधूरा,
तुम्हारी ही तरह प्रतीक्षारत—
यही ठहराव,
यही लौटना,
यही अनकहा संवाद
शायद
इसी का नाम
प्रेम है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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