वो और उसकी नाराज़गी
एक ,,,,,,,,,,,,,,
नाराज़ होती है तो
बात करना बंद कर देती है
जैसे शब्दों से उसका
कोई रिश्ता ही न रहा हो।
मेरे हर “कैसी हो?”
उसके ख़ामोश मोबाइल में
अनपढ़ा पड़ा रहता है,
जैसे कोई ख़त
जो पहुँचा तो हो,
पर खोला न गया हो।
वो जानती है
उसकी चुप्पी
मेरे लिए सबसे बड़ी सज़ा है,
और मैं
हर सज़ा काटता हूँ
बिना किसी जुर्म के।
फिर एक दिन
अचानक “हाय” लिख देती है,
जैसे कुछ हुआ ही न हो
और मैं भी
अपनी सारी शिकायतें
एक मुस्कान में समेट लेता हूँ।
ये रिश्ता भी अजीब है
उसकी नाराज़गी में
मेरी बेचैनी बसती है,
और उसकी एक छोटी-सी बात में
मेरा सारा सुकून।
दो,,,,,,,,,,,,
एक दिन मैं पूछता हूँ—
“कैसी हो?”
वो देखती है मैसेज,
पर जवाब नहीं देती
जैसे मेरे सवाल को
हवा में टाँग कर
खुद कहीं और चली गई हो।
मेरे “कैसी हो” में
छिपी होती है
सौ बातें, सौ फिक्रें,
और उसके सन्नाटे में
बस एक ठंडी दूरी।
घंटों बाद भी
नीली टिक तो आ जाती है,
पर शब्द नहीं—
जैसे उसे
मेरी आवाज़ सुनाई देती हो,
पर सुनना मंज़ूर न हो।
मैं फिर भी
हर दिन वही पूछता हूँ
“कैसी हो?”
क्योंकि मुझे पता है,
उसके जवाब से ज़्यादा
मुझे उसकी मौजूदगी चाहिए।
तीन ,,,,,,,,
एक दिन फिर पूछता हूँ—
“कैसी हो?”
इस बार
वो “ठीक हूँ” लिख देती है,
इतना छोटा जवाब
कि उसमें
न उसका दिन समाता है,
न मेरी बेचैनी।
मैं उस “ठीक” के अंदर
बहुत कुछ पढ़ने की कोशिश करता हूँ
कहीं छुपी हो शायद
कोई अधूरी शिकायत,
कोई अनकही थकान,
या मेरा ही नाम।
पर वो
शब्दों को
बस ज़रूरत भर ही खर्च करती है,
और मैं
ख़ामोशियों में भी
पूरी कहानी ढूँढ़ता रहता हूँ।
फिर भी
अगले दिन
मैं फिर पूछूँगा
“कैसी हो?”
शायद किसी दिन
वो सच में बता दे
कि वो “ठीक” नहीं है।
चार ,,,,,,
एक दिन फिर पूछता हूँ—
“कैसी हो?”
इस बार
वो ऑनलाइन होती है,
टाइप करती है…
फिर मिटा देती है—
जैसे उसके शब्दों को भी
मुझ तक आने से
डर लगता हो।
मैं स्क्रीन पर
उस “typing…” को
उम्मीद की तरह देखता हूँ,
और उसके ग़ायब होते ही
थोड़ा-सा टूट जाता हूँ।
वो शायद
बहुत कुछ कहना चाहती है,
पर कहती नहीं—
और मैं
बहुत कम पूछता हूँ,
पर समझना चाहता हूँ सब।
हम दोनों के बीच
अब बातें कम,
और अंदाज़े ज़्यादा हैं
जैसे रिश्ता नहीं,
कोई अधूरी पहेली हो।
फिर भी
अगले दिन
मैं फिर पूछूँगा
“कैसी हो?”
क्योंकि कुछ सवाल
जवाब के लिए नहीं,
रिश्ते को ज़िंदा रखने के लिए होते हैं।
पांच ,,,
और फिर
एक दिन—
समय-सी
बातों का सिलसिला
शुरू हो जाता है।
वो अचानक
लंबे-लंबे मैसेज लिखती है,
जैसे इतने दिनों की चुप्पी
एक ही साँस में
बहा देना चाहती हो।
“आज बहुत थक गई थी…”
“तुम याद आए…”
“पता है क्या हुआ…”
और मैं
हर शब्द को
ऐसे पढ़ता हूँ
जैसे सूखी ज़मीन
पहली बारिश को पीती है।
हम फिर
छोटी-छोटी बातों पर हँसते हैं,
बीते दिनों की दूरी
धीरे-धीरे पिघलती है,
और वक़्त
फिर से हमारा हो जाता है।
उसकी आवाज़ में
अब सन्नाटा नहीं,
एक अपनापन होता है—
जैसे कुछ टूटा था
पर पूरी तरह बिखरा नहीं।
मैं कुछ नहीं पूछता
कि वो क्यों चुप थी—
बस ये चाहता हूँ
कि ये बातों का मौसम
थोड़ा और ठहर जाए।
क्योंकि
उसके लौट आने में ही
मेरी दुनिया
फिर से बस जाती है।
मुकेश ,,
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