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Wednesday, 29 April 2026

इस शहर ने मुझे सिखाया

 इस शहर ने मुझे सिखाया

कि शब्दों को हमेशा सच की तरह नहीं बोला जाता,

कभी-कभी उन्हें सिर्फ़ छिपाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

यहाँ लोग मिलते हैं

और एक-दूसरे के भीतर से कुछ चुपचाप निकाल लेते हैं

बिना धन्यवाद के, बिना विदाई के।

मैंने सीखा

कि खिड़कियाँ केवल रोशनी के लिए नहीं होतीं,

वे बाहर की दुनिया को थोड़ी देर के लिए सहने का तरीका हैं।

कभी-कभी मैं अपने ही नाम को

अजनबी की तरह देखता हूँ,

जैसे वह किसी और की जेब से गिर पड़ा हो।

यहाँ यादें

पानी पर लिखी हुई इबारत हैं

और फिर भी लोग उन्हें किताबों की तरह ढोते हैं।

रातें धीरे-धीरे मुझे खोलती हैं

जैसे कोई पुराना लिफ़ाफ़ा

जिसमें कोई पुराना खत नहीं,

सिर्फ़ एक खालीपन होता है

जो अब भी किसी का इंतज़ार कर रहा है।

मैंने चाहा था

कि चीज़ें सरल हों,

लेकिन यहाँ हर सादगी के भीतर

एक और उलझन सोई रहती है।

और अब

मैं खुद को भी उसी तरह पढ़ता हूँ

जैसे कोई अधूरी पंक्ति

जिसका अर्थ

कभी पूरा नहीं होता,

सिर्फ़ बदलता रहता है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,

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