तुम जो देखते हो—वह तुम नहीं, तुम्हारा प्रदर्शन है
(Byung-Chul Han से प्रेरित एक गद्यांश)
अब कोई तुम्हें देख नहीं रहा—
और यही सबसे बड़ा भ्रम है।
क्योंकि देखने वाला
बाहर नहीं रहा,
वह तुम्हारे भीतर बस गया है।
तुम अपने आप को
लगातार प्रस्तुत करते हो—
जैसे जीवन कोई मंच हो,
और तुम
एक साथ अभिनेता भी हो
और दर्शक भी।
तुम थकते हो—
पर यह थकान
किसी बाहरी दबाव से नहीं आती।
यह उस निरंतर प्रयास से आती है
जिसमें तुम
अपने आप को
बेहतर, स्पष्ट, आकर्षक
दिखाने की कोशिश करते हो।
Byung-Chul Han इसे
“पॉज़िटिविटी का अत्याचार” कह सकते थे
जहाँ अब कोई तुम्हें मजबूर नहीं करता,
तुम खुद को
खुद से अधिक होने के लिए
धकेलते हो।
तुम स्वतंत्र हो
पर इस स्वतंत्रता में
कोई विराम नहीं है।
तुम काम करते हो,
खुद को सुधारते हो,
खुद को दिखाते हो
और धीरे-धीरे
खुद को खो देते हो।
यहाँ कोई जेल नहीं है
पर तुम कैद हो।
कोई आदेश नहीं
पर तुम आज्ञाकारी हो।
कोई निगरानी नहीं
पर तुम लगातार
अपने आप को
देख रहे हो।
और यही
इस समय की सबसे सूक्ष्म विडंबना है।
पहले सत्ता
तुम्हें दबाती थी
अब वह तुम्हें
स्वतंत्र बनाकर
तुम्हारे भीतर बैठ गई है।
तुम “मैं” कहते हो
पर वह “मैं”
एक प्रोजेक्ट बन चुका है।
एक ऐसा प्रोजेक्ट
जिसे तुम्हें लगातार अपडेट करना है
जैसे कोई प्रोफ़ाइल
जो कभी पूरी नहीं होती।
और इस अनंत प्रक्रिया में
तुम थकते नहीं,
तुम खाली हो जाते हो।
शायद
अब विद्रोह यह नहीं
कि तुम नियम तोड़ो
बल्कि यह है
कि तुम
कुछ समय के लिए
कुछ भी न बनो।
न बेहतर,
न अधिक,
न आकर्षक
बस
अदृश्य हो जाओ।
क्योंकि कभी-कभी
सबसे सच्चा होना
यही है
कि तुम
दिखना बंद कर दो।
मुकेश ,,,,,,,
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