जब कोई अर्थ नहीं—फिर भी सुबह होती है
जब कोई अर्थ नहीं—फिर भी सुबह होती है
(Albert Camus से प्रेरित एक गद्यांश)
सुबह हुई।
यह एक साधारण-सा वाक्य है—
इतना साधारण
कि हम अक्सर इसे देखे बिना ही जी लेते हैं।
पर ठहरकर देखो
यह क्यों हुई?
किसके लिए?
सूरज उगा
पर उसने किसी को नहीं पुकारा।
रोशनी फैली
पर उसने किसी उद्देश्य की घोषणा नहीं की।
दुनिया
अपनी पूरी निष्ठुरता में
चलती रही।
और तुम—
जाग गए।
यह जागना
कोई विजय नहीं था,
न ही किसी योजना का हिस्सा।
बस
नींद टूट गई।
तुमने आँखें खोलीं
और वही दुनिया सामने थी,
जिसके बारे में तुमने
कल भी सोचा था
“इसका अर्थ क्या है?”
और आज भी
कोई उत्तर नहीं था।
Albert Camus यहीं से शुरू करते
इस टकराव से:
मनुष्य
अर्थ चाहता है।
दुनिया
कुछ नहीं देती।
और इस बीच
जो खिंचाव है
वही absurd है।
तुम चाहो तो
इससे भाग सकते हो—
धर्म में,
कल्पना में,
या उस झूठ में
कि “कहीं न कहीं
कोई बड़ा उद्देश्य होगा।”
या फिर
तुम एक और रास्ता चुन सकते हो।
तुम यह स्वीकार कर सकते हो
कि कोई अंतिम अर्थ नहीं है
और फिर भी
जी सकते हो।
यह आसान नहीं है।
क्योंकि इसका मतलब है
हर सुबह उठना
बिना किसी अंतिम कारण के।
हर काम करना
बिना किसी अंतिम आश्वासन के।
और फिर भी—
पूरी तरह करना।
जैसे
कोई तुम्हें देख नहीं रहा,
कोई तुम्हें जज नहीं कर रहा,
कोई तुम्हारे प्रयास को
किसी बड़े अर्थ में नहीं बदलेगा।
फिर भी
तुम चलते हो।
यह हार नहीं है।
यह विद्रोह है।
एक शांत,
लगातार विद्रोह
जहाँ तुम कहते हो:
“हाँ, दुनिया निरर्थक हो सकती है—
पर मैं
अपने होने को
पूरी तीव्रता से जिऊँगा।”
और शायद
यही सबसे सच्ची गरिमा है—
कि जब कोई अर्थ नहीं दिया गया,
तब भी
तुम जीने से इंकार नहीं करते।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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