तुम्हारे भीतर जो बोलता है, वह कौन है?
(Michel Foucault से प्रेरित एक गद्यांश)
तुम सोचते हो
कि तुम अपने विचारों के स्वामी हो।
कि जो शब्द तुम्हारे भीतर उठते हैं,
वे तुम्हारे हैं
तुम्हारी स्वतंत्रता के प्रमाण।
पर ठहरो।
पहला शब्द
तुमने कब चुना था?
तुम्हें याद नहीं होगा
क्योंकि भाषा
तुम्हारे जन्म से पहले
तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी।
तुम उसमें आए
जैसे कोई पहले से लिखी किताब में
एक नया वाक्य जुड़ जाए।
तुमने “मैं” कहना सीखा
पर यह नहीं सीखा
कि यह “मैं”
किसने गढ़ा।
स्कूल ने तुम्हें सिखाया
कैसे सोचना है—
इतिहास ने बताया
क्या याद रखना है—
समाज ने तय किया
किसे सामान्य कहना है,
किसे विचलन।
और तुम
धीरे-धीरे
इन सबके बीच
एक “स्वतंत्र व्यक्ति” बन गए।
Michel Foucault शायद मुस्कुराते
और पूछते:
“क्या सच में?”
क्योंकि सत्ता (power)
हमेशा आदेश नहीं देती
वह तुम्हारे भीतर
एक आदत की तरह बस जाती है।
तुम सोचते हो
कि तुम चुन रहे हो
पर अक्सर
तुम सिर्फ़ वही दोहरा रहे होते हो
जो तुम्हें सिखाया गया है।
यहाँ तक कि
तुम्हारा विरोध भी
कभी-कभी
उसी ढाँचे का हिस्सा होता है
जिसका तुम विरोध कर रहे हो।
तो फिर
स्वतंत्रता कहाँ है?
क्या वह है भी?
या वह भी
एक ऐसा विचार है
जो तुम्हें दिया गया
ताकि तुम
अपनी ही संरचना को
देख न सको?
कमरे में एक दर्पण है
तुम उसमें देखते हो
और कहते हो,
“यह मैं हूँ।”
पर अगर वह दर्पण
किसी और ने बनाया हो
तो जो तुम देख रहे हो,
वह तुम हो
या एक स्वीकृत रूप?
यह गद्य
तुम्हें डराने के लिए नहीं
बल्कि एक असुविधा देने के लिए है।
क्योंकि जब तक
तुम्हें यह असुविधा नहीं होती,
तुम यह नहीं देख पाओगे
कि तुम्हारे भीतर जो बोलता है
वह हमेशा “तुम” नहीं होता।
और शायद
यही देखने से
एक दूसरी संभावना खुलती है
जहाँ तुम
पहली बार
सचमुच
चुप होकर सुन सको
कि तुम्हारे भीतर
कौन बोल रहा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment