विघटन की धीमी कला
(Jacques Derrida से प्रेरित एक गद्यांश)
तुम एक वाक्य पढ़ते हो
और मान लेते हो
कि उसका एक अर्थ है।
पर अर्थ
कभी अकेला नहीं आता।
वह हमेशा
किसी और अर्थ की छाया में खड़ा होता है
जैसे हर शब्द
अपने भीतर
अपने ही विरोध को छुपाए हो।
तुम “सत्य” कहते हो
और उसके साथ ही
एक अदृश्य “असत्य”
भी उपस्थित हो जाता है।
तुम “केंद्र” बनाते हो
और उसी क्षण
उसके चारों ओर
परिधियाँ फैलने लगती हैं।
Jacques Derrida ने
हमें यह नहीं सिखाया
कि अर्थ नहीं होते
बल्कि यह कि
वे कभी स्थिर नहीं होते।
हर पाठ
एक खुला क्षेत्र है,
जहाँ अर्थ
रुकता नहीं,
बस टलता रहता है
एक शब्द से दूसरे शब्द तक,
एक संकेत से दूसरे संकेत तक।
तुम पकड़ना चाहते हो
पर अर्थ
हर बार
तुम्हारी पकड़ से
एक क़दम आगे निकल जाता है।
यह कोई खेल नहीं,
बल्कि भाषा की संरचना है।
क्योंकि हर शब्द
किसी और शब्द की ओर इशारा करता है
और यह क्रम
कभी समाप्त नहीं होता।
तो क्या
कोई अंतिम अर्थ नहीं?
शायद नहीं—
या अगर है भी,
तो वह हमेशा
हमारी पहुँच से
थोड़ा बाहर ही रहता है।
और यही
इस पूरी प्रक्रिया की सुंदरता है।
क्योंकि यदि अर्थ
एक जगह ठहर जाता
तो भाषा
जीवित नहीं रहती।
विघटन (deconstruction)
तोड़ना नहीं है
यह देखना है
कि जो बना हुआ है,
वह किन अदृश्य धागों से बना है।
और जब तुम
उन धागों को देख लेते हो
तो तुम्हें पता चलता है
कि कोई भी संरचना
अंतिम नहीं है।
न तुम्हारा विचार,
न तुम्हारा विश्वास,
न तुम्हारा “मैं”।
सब कुछ
पढ़ा जा सकता है
और हर पढ़ना
एक नया अर्थ रचता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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