तर्क की रोशनी में मनुष्य
(Bertrand Russell से प्रेरित एक गद्यांश)
मनुष्य एक अजीब जीव है
वह ब्रह्मांड के बीच खड़ा होकर
अर्थ की माँग करता है,
जैसे यह उसका अधिकार हो।
जबकि ब्रह्मांड
न तो उसके प्रश्नों से विचलित होता है,
न उसके उत्तरों से संतुष्ट।
तारों की ठंडी रोशनी में
कोई नैतिकता नहीं छिपी होती,
न ही आकाशगंगाएँ
किसी उद्देश्य की घोषणा करती हैं।
फिर भी मनुष्य
अपने छोटे-से जीवन में
सत्य की एक रेखा खींचने की कोशिश करता है
तर्क के सहारे।
तर्क—
यह कोई भावनात्मक सांत्वना नहीं,
बल्कि एक कठोर अनुशासन है।
यह तुम्हें यह नहीं कहता
कि जीवन सुंदर है,
बल्कि यह पूछता है—
“तुम यह क्यों मानते हो?”
और इसी प्रश्न में
एक विचित्र मुक्ति छिपी है।
क्योंकि जैसे ही तुम
अपने विश्वासों को
जाँचने लगते हो,
वे या तो टूट जाते हैं
या और स्पष्ट हो जाते हैं।
और दोनों ही स्थितियाँ
भ्रम से बेहतर हैं।
मनुष्य की त्रासदी यह नहीं
कि ब्रह्मांड निरर्थक हो सकता है
बल्कि यह कि वह
बिना जाँचे हुए अर्थों से
अपने को भर लेता है।
Bertrand Russell ने शायद यही चाहा था—
कि हम अपने विचारों को
किसी परंपरा या भय के हवाले न करें,
बल्कि उन्हें
प्रमाण, तर्क और ईमानदारी की कसौटी पर रखें।
इससे जीवन आसान नहीं होता
पर यह अधिक सच्चा हो जाता है।
और शायद
सच्चाई ही वह एकमात्र चीज़ है
जिसके लिए
मनुष्य का होना
औचित्य पा सकता है।
मुकेश ,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment