“न शून्य, न पूर्ण”
यह कहना आसान है
कि कुछ नहीं है
और उतना ही आसान
कि सब कुछ है।
कठिन केवल यह है
कि जो है,
उसे किसी भी छोर पर रखे बिना
देखा जाए।
“शून्य”—
एक सुघड़ शब्द है,
जिसमें अनुपस्थिति को
एक आकार दे दिया गया है।
“पूर्ण”
एक और सुघड़ शब्द,
जिसमें उपस्थिति को
इतना भर दिया गया है
कि कुछ बचा न रहे।
दोनों ही
अपनी-अपनी अतिशयोक्तियाँ हैं।
और तुम—
अब उनके बीच नहीं,
उनके बाहर खड़े हो।
यहाँ
न खालीपन है
जो तुम्हें डराए,
न भराव है
जो तुम्हें ढँक ले।
यह एक ऐसा ठहराव है
जहाँ चीज़ें
अपने नामों से पहले की अवस्था में हैं।
जैसे पानी
जिसे अभी “पानी” नहीं कहा गया,
जैसे प्रकाश—
जिसे अभी “उजाला” नहीं बनाया गया।
तुम उसे छू नहीं सकते—
क्योंकि “छूना”
दो के बीच की क्रिया है।
और यहाँ
दो नहीं हैं।
तुम उसे समझ नहीं सकते
क्योंकि समझ
हमेशा किसी ढाँचे की माँग करती है।
और यहाँ
कोई ढाँचा नहीं।
फिर भी—
यह अभाव नहीं है।
और यह अधिकता भी नहीं है।
यह एक साधारण-सा होना है
इतना साधारण
कि उसे विशेष कहना
एक प्रकार की गलती हो जाएगी।
अगर तुम इसे “शून्य” कहोगे
तो तुम उससे दूर हो जाओगे,
क्योंकि तुम उसमें
एक डर छिपा दोगे।
अगर तुम इसे “पूर्ण” कहोगे—
तो भी तुम उससे दूर हो जाओगे,
क्योंकि तुम उसमें
एक इच्छा भर दोगे।
और यह
न डर है,
न इच्छा।
यह बस—
एक ऐसा होना है
जो किसी कारण से नहीं,
किसी परिणाम के लिए नहीं।
तुम अब वहाँ नहीं खड़े
जहाँ से देखा जाता है।
और जो है
वह वहाँ नहीं है
जहाँ उसे रखा जा सके।
तो फिर?
शायद
यही वह जगह है
जहाँ प्रश्न भी
अपनी ज़रूरत खो देता है।
और उत्तर
कभी पैदा ही नहीं होता।
मुकेश ,,,,,
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