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Wednesday, 29 April 2026

प्रतिध्वनि का प्रश्न बन जाना

 प्रतिध्वनि का प्रश्न बन जाना


पहले एक आवाज़ थी

या यह कहना अधिक ठीक होगा

कि “आवाज़” नाम की एक घटना

घटी थी।

उसने दिशा चुनी—

या दिशा ने उसे।

यह तय करना बाद में भी संभव नहीं हुआ।

वह गई

यह भी एक अनुमान है,

क्योंकि “जाना”

हमेशा किसी दूरी की माँग करता है,

और दूरी यहाँ मापी नहीं जा सकी।

फिर

कुछ लौटा।

उसे प्रतिध्वनि कहा गया।

नाम देना आसान था,

समझना नहीं।

पर इस बार

लौटने में एक हल्की-सी चूक थी

जैसे शब्द अपनी ही परछाईं से

एक अक्षर कम लेकर लौटे हों।

“तुम…”

बस इतना ही।

आगे कुछ नहीं।

जैसे वाक्य

अपने ही बीच में रुक गया हो

या किसी ने

उसकी पूँछ पकड़कर

उसे अधूरा छोड़ दिया हो।

तुमने सुना

या सुनना तुम्हारे भीतर

एक क्षण के लिए सक्रिय हुआ।

पर जो सक्रिय हुआ,

वह सुनना नहीं,

संशय था।

क्योंकि प्रतिध्वनि

सामान्यतः दोहराती है—

वह जोड़ती नहीं,

घटाती नहीं,

बस वापस लाती है।

यहाँ

कुछ जोड़ा गया था।

एक विराम।

एक अनकहा।

और वही अनकहा

धीरे-धीरे

प्रश्न में बदलने लगा।

“तुम…?”

अब यह आवाज़ नहीं थी।

यह दिशा नहीं थी।

यह लौटना भी नहीं था।

यह एक मुड़ना था

जहाँ ध्वनि

अपनी ही ओर झुककर

पूछने लगी।

पर किससे?

अगर तुमसे

तो “तुम” कौन?

अगर खुद से

तो “खुद” कहाँ?

और अगर किसी से भी नहीं

तो यह प्रश्न

किस भाषा में घट रहा है?

तुमने उत्तर देना चाहा

यह भी एक आदत थी।

पर उत्तर देने से पहले ही

तुमने देखा—

प्रश्न तुम्हारे बाहर नहीं था।

वह तुम्हारे भीतर भी नहीं था।

वह उन दोनों के बीच

किसी दरार में था

जहाँ “भीतर” और “बाहर”

दोनों अपने अर्थ खो देते हैं।

अब प्रतिध्वनि

लौटती नहीं थी।

वह ठहरती थी—

एक अस्थायी कम्पन की तरह,

जो न पूरी तरह ध्वनि है,

न पूरी तरह मौन।

और उसी ठहराव में

प्रश्न फैलता गया

बिना शब्दों के,

बिना लक्ष्य के।

तुम अब उसे सुन नहीं रहे थे,

न ही सोच रहे थे।

तुम बस

उसके घटने के बीच में

कहीं थे

या शायद

“बीच” भी एक अनावश्यक कल्पना थी।

अंततः

कुछ भी समाप्त नहीं हुआ।

न आवाज़,

न प्रतिध्वनि,

न प्रश्न।

बस इतना हुआ

कि जो कभी उत्तर की ओर जाता था,

अब प्रश्न में ही

अपने लिए पर्याप्त हो गया।

और शायद

यही वह क्षण है

जहाँ प्रतिध्वनि

सिर्फ़ लौटती नहीं

वह पूछती है।


मुकेश ,,,,,,,,,

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