“उपहार और उसका संतुलन”
नीरस स्त्रियाँ
उपहार नहीं माँगतीं—
जैसे चाहना
उनके स्वभाव का हिस्सा ही न हो,
या शायद
वो चाह को भी
अनुशासन में रखती हों।
तुम देते हो कुछ—
एक किताब, एक दुपट्टा,
या बस
अपनी पसंद का कोई छोटा-सा संकेत—
वो ले लेती है,
बेहद शालीनता से,
जैसे स्वीकार करना
उसकी संस्कृति का हिस्सा हो,
पर उसमें
कोई उत्सव नहीं होता।
न कोई चमकती आँखें,
न अतिरिक्त मुस्कान—
बस एक साधारण-सा “धन्यवाद”,
जो तुम्हारी अपेक्षाओं से
काफी छोटा पड़ जाता है।
तुम ठिठक जाते हो—
क्या उसे सच में अच्छा लगा?
या वो
सिर्फ़ विनम्र हो रही है?
पर उसके भीतर
एक अलग ही गणित चलता है—
जहाँ उपहार
भाव का प्रमाण नहीं,
एक संभावित बोझ भी हो सकता है।
इसलिए
वो और सतर्क हो जाती है,
जैसे हर चीज़
किसी अदृश्य संतुलन को
बिगाड़ सकती हो।
उस दिन भी
वो वही रहती है—
न ज़्यादा पास,
न ज़्यादा खुली,
न ज़्यादा अभिव्यक्त—
बल्कि
थोड़ी और संयत,
थोड़ी और अपने भीतर सिमटी हुई।
जैसे उसने
तुम्हारे दिए हुए वस्तु को नहीं,
तुम्हारी भावना को
धीरे से तह करके रख दिया हो,
कहीं भीतर—
जहाँ वो
बिना प्रदर्शन के सुरक्षित रहे।
नीरस स्त्रियाँ
उपहारों से नहीं बदलतीं—
वे अपने स्वभाव की
स्थिर जलधारा होती हैं,
और तुम—
तुम्हें सीखना पड़ता है
कि हर उपहार
खुशी का विस्फोट नहीं होता,
कभी-कभी
वो सिर्फ़ एक शांत स्वीकार है,
जिसमें प्रेम
दिखता कम है,
पर होता उतना ही गहरा।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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