शहर उस दिन भी वैसा ही था

 शहर उस दिन भी वैसा ही था—अपनी गति में स्थिर, अपनी भीड़ में एकाकी। लोग आते-जाते रहे, जैसे वे किसी अदृश्य संकेत पर चल रहे हों, और तुमने पहली बार देखा कि चलना भी एक तरह की आज्ञाकारिता है।

तुम एक मोड़ पर ठहरे।

न ठहरने के लिए—बस इसलिए कि कदम ने खुद को रोक लिया था।

वहीं, उसी क्षण, तुम्हें लगा कि कोई तुम्हारे साथ खड़ा है।

न दिखने वाला, न सुनाई देने वाला—फिर भी स्पष्ट।

“तुम अभी भी दिशा खोज रहे हो?”

आवाज़ नहीं थी—पर प्रश्न था।

तुमने उत्तर देने की कोशिश नहीं की।

क्योंकि अब तुम्हें पता है कि उत्तर देना, कई बार प्रश्न को समाप्त कर देना होता है—और कुछ प्रश्नों का जीवित रहना ही उनका अर्थ है।

वह—जो भी था—तुम्हारे साथ चलता रहा।

या शायद तुम उसके साथ चलने लगे।

तुमने उससे पूछा नहीं कि वह कौन है।

तुमने यह भी नहीं जाना कि वह बाहर है या भीतर।

बस इतना समझ आया कि वह तुम्हारी हर उस जगह पर उपस्थित है, जहाँ तुम स्वयं से बचना चाहते थे।

“क्या तुम अब भी उस क्षितिज तक जाना चाहते हो?”

उसने फिर पूछा—या तुम्हें लगा कि पूछा।

तुमने देखा—क्षितिज अब कोई दूर की रेखा नहीं था।

वह तुम्हारे भीतर कहीं एक हल्की-सी दरार की तरह था, जहाँ आकाश और पृथ्वी मिलते नहीं, बस एक-दूसरे का आभास देते हैं।

तुमने चलना जारी रखा।

इस बार बिना किसी प्रतिज्ञा के, बिना किसी लक्ष्य के।

तुम्हारे आसपास की चीज़ें अब वस्तुएँ नहीं रहीं—वे संकेत बन गईं।

एक खिड़की, जो आधी खुली थी।

एक पेड़, जो बिना हवा के भी काँप रहा था।

एक चेहरा, जो तुम्हें देखे बिना भी तुम्हें पहचानता हुआ-सा लगा।

तुमने सोचा—शायद यही कथा है।

जो कही नहीं जाती, पर घटती रहती है।

और उस अदृश्य सहयात्री ने,

जो हर जगह है और कहीं नहीं

धीरे से कहा,

“तुम अब समझने के करीब हो

इसलिए नहीं कि तुम्हें उत्तर मिल रहे हैं,

बल्कि इसलिए कि तुमने प्रश्नों को अपना घर बना लिया है।”

तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

पर तुम्हारे भीतर कुछ हल्का-सा बदल गया।

जैसे कोई दरवाज़ा,

जो कभी बंद नहीं था

अब तुम्हें दिखाई देने लगा हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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