दोपहर एक अजीब तरह की पारदर्शिता लेकर आई थी

 दोपहर एक अजीब तरह की पारदर्शिता लेकर आई थी—जैसे रोशनी ने अपने ही अर्थ को हल्का कर दिया हो। सड़कों पर छायाएँ थीं, पर वे किसी वस्तु से बंधी हुई नहीं लगती थीं; वे अपने आप में स्वतंत्र आकृतियाँ थीं, जो बस थोड़ी देर के लिए धरती पर टिक गई हों।

तुम एक पुरानी इमारत के सामने रुके।
उसकी दीवारों पर समय ने अपने हस्ताक्षर नहीं किए थे—बल्कि उन्हें धीरे-धीरे मिटाया था।

दरवाज़ा आधा खुला था।
तुमने भीतर झाँका—और पाया कि अंदर कोई कमरा नहीं है, केवल एक और दरवाज़ा है।

“तुम्हें हर बार भीतर जाने की ज़रूरत क्यों लगती है?”
वह फिर उपस्थित था—बिना आकार, बिना आग्रह।

तुमने इस बार उसकी ओर देखा—या यूँ कहो, उस दिशा में जहाँ तुम्हें उसका होना महसूस हुआ।
“शायद इसलिए,” तुमने सोचा, “कि बाहर अब पर्याप्त नहीं लगता।”

वह चुप रहा।
उसकी चुप्पी में एक हल्की-सी असहमति थी—जैसे वह तुम्हारे उत्तर को सुनकर भी उसे स्वीकार नहीं कर रहा हो।

तुमने दरवाज़ा नहीं खोला।
तुमने उसे वैसे ही रहने दिया—अधखुला, अधूरा, संभावनाओं के बीच ठहरा हुआ।

और उसी क्षण तुम्हें एक अजीब-सी बात समझ आई—
कि हर भीतर, दरअसल एक और बाहर ही होता है,
और हर बाहर किसी भीतर की ही प्रतिछाया।

तुम आगे बढ़े।
इस बार कदमों में कोई हड़बड़ी नहीं थी, पर एक सूक्ष्म सजगता थी—जैसे तुम किसी अदृश्य लय के साथ चल रहे हो।

एक बच्चा सड़क के किनारे बैठा था—मिट्टी में उँगलियों से कुछ बनाता हुआ।
तुमने झुककर देखा—वह कोई आकृति नहीं थी, बस रेखाओं का एक जाल था, जो हर क्षण बदल रहा था।

“यह क्या है?” तुमने बिना शब्दों के पूछा।

बच्चे ने सिर उठाया—उसकी आँखों में कोई उत्तर नहीं था, केवल एक स्थिर दृष्टि।
फिर उसने अपने बनाए हुए को मिटा दिया—बिना किसी हिचक के।

तुमने पहली बार देखा कि सृजन और विनाश के बीच कोई अंतराल नहीं होता।
वे एक ही क्रिया के दो क्षण हैं।

“क्या तुम अब भी कुछ स्थायी खोज रहे हो?”
वह स्वर फिर आया—इस बार और भी धीमा।

तुमने सोचा—और पाया कि इस प्रश्न का कोई सीधा उत्तर नहीं है।
क्योंकि जो स्थायी है, वह शायद खोज के बाहर ही है;
और जो खोज में है, वह स्वभावतः अस्थायी है।

तुमने उस बच्चे की ओर फिर देखा
वह अब कहीं और चला गया था,
जैसे वह कभी वहाँ था ही नहीं।

तुमने अपनी हथेली को देखा
रेखाएँ थीं, पर उनमें कोई निश्चित कथा नहीं थी।
वे भी शायद उसी मिट्टी की तरह थीं—हर क्षण बदलती हुई।

और तब तुम्हें लगा
कि शायद जीवन को समझना नहीं,
उसकी इस अनवरत बदलती हुई बनावट के साथ चलना ही पर्याप्त है।

तुमने एक लंबी साँस ली।
इस बार यह जानने के लिए नहीं कि तुम जीवित हो
बल्कि यह महसूस करने के लिए कि

तुम हर क्षण
कुछ और बन रहे हो

और उसी में
धीरे-धीरे
कुछ खो भी रहे हो।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,,


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