साँझ इस बार धीरे नहीं उतरी
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साँझ इस बार धीरे नहीं उतरी—वह एक साथ फैल गई, जैसे किसी ने आकाश की परत को अचानक उलट दिया हो। रोशनी और अँधेरे के बीच कोई संक्रमण नहीं था; केवल एक हल्का-सा धुंधलका, जिसमें चीज़ें अपने नाम खोने लगती हैं।
तुमने पाया कि तुम अब किसी परिचित रास्ते पर नहीं हो।
न इसलिए कि रास्ता बदल गया है—
बल्कि इसलिए कि पहचान की आदत तुम्हारे भीतर से कम हो गई है।
एक छोटी-सी चाय की दुकान थी,
जहाँ कोई ग्राहक नहीं था,
पर केतली से भाप उठ रही थी—लगातार, जैसे किसी अदृश्य संवाद की तरह।
तुम बैठ गए।
बिना पूछे, बिना बुलाए।
दुकानदार ने तुम्हारी ओर देखा नहीं—
फिर भी एक कप तुम्हारे सामने रख दिया।
“तुम यहाँ पहले भी आए हो,” उसने कहा।
उसकी आवाज़ में न दावा था, न जिज्ञासा—सिर्फ एक तथ्य।
तुमने सोचा—
और पाया कि स्मृति अब किसी घटना का रिकॉर्ड नहीं रही,
वह एक अनुभूति है, जो बिना प्रमाण के भी सत्य लगती है।
“क्या हर जगह लौटना होता है?”
तुमने पूछा—या यह प्रश्न तुम्हारे भीतर ही उठा।
दुकानदार ने हल्की मुस्कान के साथ चाय की सतह को देखा—
“लौटना नहीं,” उसने धीरे से कहा,
“बस पहचान का भ्रम दोहराया जाता है।”
तुमने कप उठाया।
चाय का स्वाद वैसा नहीं था जैसा तुमने सोचा था—
वह न मीठी थी, न कड़वी।
जैसे स्वाद ने भी किसी एक पक्ष को चुनने से इंकार कर दिया हो।
वह—जो हर जगह था—इस बार मौन रहा।
पर उसका मौन अब अनुपस्थिति नहीं था;
वह एक तरह की अनुमति थी—कि तुम स्वयं अपने अनुभव के साथ रहो।
तुमने आसपास देखा—
दुकान की दीवार पर एक घड़ी टंगी थी,
जिसकी सुइयाँ चल रही थीं,
पर समय आगे नहीं बढ़ रहा था।
“अगर समय रुका नहीं है,
तो यह आगे क्यों नहीं जा रहा?”
तुम्हारे भीतर एक क्षण के लिए पुरानी जिज्ञासा लौटी।
दुकानदार ने उत्तर नहीं दिया।
उसने बस खिड़की की ओर इशारा किया।
तुमने बाहर देखा—
वहाँ कोई दृश्य नहीं था,
सिर्फ एक फैलती हुई धुंध,
जिसमें आकार बनने से पहले ही घुल जाते थे।
और तब तुम्हें समझ आया—
कि आगे बढ़ना शायद किसी दिशा में जाना नहीं,
बल्कि उस धुंध को स्वीकार करना है
जिसमें कोई निश्चित आकृति नहीं बनती।
तुमने चाय खत्म की।
कप खाली था—पर उसमें एक हल्की-सी गर्माहट अभी भी बची थी।
तुम उठे।
दुकानदार ने तुम्हें रोका नहीं,
न ही विदा दी।
तुम बाहर आए—
और पाया कि रास्ता वही है,
पर तुम्हारा चलना बदल गया है।
अब तुम यह नहीं देख रहे कि तुम कहाँ जा रहे हो।
तुम यह देख रहे हो कि
तुम हर कदम के साथ
कितना कम जानते जा रहे हो—
और उसी अज्ञान में
एक नई तरह की सहजता जन्म ले रही है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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