जब दूरी भी अपने अर्थ खोने लगती है—तुम पाते हो कि निकट और दूर के बीच का भेद धीरे-धीरे गल रहा है। जो कभी तुम्हारे बहुत पास था, वह अब किसी दूरस्थ बिंदु-सा लगता है; और जो अनजाना था, वह बिना परिचय के भी तुम्हारे भीतर जगह बनाने लगता है। मानो संबंधों का गणित किसी और ही नियम से चल रहा हो—जहाँ जोड़ और घटाव एक ही प्रक्रिया के दो नाम हैं।
तुम चलते हो, पर अब यात्रा का बोध नहीं होता। कदम उठते हैं, पर दिशा का आग्रह नहीं रहता। जैसे रास्ता ही तुम्हें अपने साथ लिए जा रहा हो—और तुमने उसके विरुद्ध चलने का विचार भी त्याग दिया हो। यह समर्पण नहीं है, यह थकान भी नहीं—यह केवल एक स्वीकृति है कि हर प्रतिरोध अंततः उसी वृत्त में लौट आता है, जिससे वह भागना चाहता था।
तुम्हारे भीतर अब भी कुछ-कुछ बचा है—पर वह किसी स्पष्ट आकृति में नहीं। वह एक हल्की-सी आहट है, जैसे बंद कमरे में कहीं बहुत धीरे से कोई खिड़की खुली हो। तुम उसे पकड़ना नहीं चाहते, क्योंकि जानते हो कि पकड़ते ही वह छूट जाएगा। तुम बस उसके साथ बने रहते हो—बिना नाम दिए, बिना अर्थ थोपे।
धीरे-धीरे तुम सीखने लगते हो कि हर अनुभव को भाषा में बदलना आवश्यक नहीं। कुछ चीज़ें केवल जी जाने के लिए होती हैं—वे शब्दों में आते ही अपना ताप खो देती हैं। तुम चुप रहते हो, और तुम्हारी चुप्पी अब खाली नहीं लगती; उसमें एक तरह का घनत्व है, जैसे वह भी कुछ कह रही हो—पर बिना ध्वनि के।
तुम्हें यह भी दिखने लगता है कि जो टूटन थी, वही तुम्हारी बनावट का हिस्सा बन चुकी है। उसे अलग करने की कोशिश अब तुम्हें अधूरा कर देगी। तुम अपने ही विखंडन के साथ एक नए संतुलन में खड़े हो—जहाँ स्थिरता का अर्थ जड़ होना नहीं, बल्कि लगातार बदलते हुए भी बिखरने से बचना है।
अब आगे क्या है?
शायद कोई बड़ा उत्तर नहीं।
शायद केवल छोटे-छोटे क्षण—जो आते हैं, ठहरते हैं, और बिना निशान छोड़े चले जाते हैं।
और तुम—
उनके बीच से गुजरते हुए—
धीरे-धीरे यह समझने लगते हो कि
जीवन कोई रेखा नहीं,
एक सूक्ष्म कंपन है—
जिसे पकड़ा नहीं जा सकता,
पर महसूस किया जा सकता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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